मैसूर राज्य

    विजय नगर राज्य के समय में ही 1612 ई0 में ओडियार नामक राजा ने मैसूर राज्य की स्थापना की इस मैसूर राज्य में आगे चलकर दो प्रमुख शासक हुए-हैदर अली एवं टीपू। इन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष जारी रखा। टीपू, हैदर अली दक्षिण भारत का पहला शासक था जिसे अंग्रेजों को पराजित करने में सफलता मिली। दक्षिण में मैसूर राज्य और अंग्रेजों के बीच कुल चार युद्ध हुए। इन युद्धों की एक खास विशेषता यह थी कि इसमें मराठे और हैदराबाद के निजाम अंग्रेजों द्वारा बनाये गये त्रिगुट में शामिल थे।

हैदर अली 

जन्म:-मैसूर के कोलार जिले में 1722 ई0 में

पिता का नाम:-फतेह मुहम्मद
    मैसूर के प्रधानमंत्री नेंन्जराज ने 1755 ई0 में हैदर अली को डिन्डीगल का फौजदार बनाया। इसी के बाद 1761 ई0 में वह स्वयं मैसूर राज्य का प्रमुख बन गया तथा नन्ज राज की हत्या कर दी।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69)

इस युद्ध की शुरुआत 1767 में हैदर ने की जब कन्नड़ तट पर आये एक अंग्रेजी बेडे को नष्ट कर दिया गया अतः युद्ध प्रारम्भ हो गया। हैदर ने मंगलौर पर अधिकार कर लिया तथा मद्रास पर आक्रमण कर अंग्रेजों को बहुत क्षति पहुँचाई, विवश होकर अंग्रेजों को मद्रास की सन्धि करनी पड़ी इस तरह प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध हैदर अली के पक्ष में रहा।

मद्रास की सन्धि (1769)

 इसी सन्धि के द्वारा प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध समाप्त हुआ दोनों ने एक दूसरे के जीते हुए क्षेत्रों को वापस कर दिया परन्तु हैदर के पास करुर का क्षेत्र रहने दिया गया। यह एक रक्षात्मक सन्धि थी इसमें यह भी प्रावधान था कि दोनों के क्षेत्रों पर किसी तीसरी शक्ति द्वारा आक्रमण करने पर एक-दूसरे की मदद की जायेगी परनतु जब 1770 ई0 में मराठा पेशवा माधवराव ने हैदर पर आक्रमण किया तब अंग्रेजों ने हैदर की कोई सहायता नहीं की फलस्वरूप हैदर ने 1772-73 में कुर्ग और मालाबार पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। हैदर ने कर्नाटक की राजधानी अरकाट पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया कर्नाटक का नवाब भागकर अंग्रेजों के पास चला गया फलस्वरूप द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध प्रारम्भ हुआ।

द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध (1780-84)

इस युद्ध में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हैदर कोेेे पोर्टोनोवा, और पोलीलोर के युद्धों में पराजित किया इसी बीच 1782 में हैदर की मृत्यु हो गयी उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे टीपू ने युद्ध जारी रखा।

टीपू (1782-99)

टीपू ने द्वितीय युद्ध अपने पिता की मृत्यु के बाद भी जारी रखा अन्ततः टीपू और अंग्रेजों के बीच मंगलौर की सन्धि हो गई जिससे युद्ध समाप्त हो गया।

मंगलौर की सन्धि (1784)

इस सन्धि पर हस्ताक्षर अंग्रेजों की तरफ से लार्ड मैकार्टनी ने की परन्तु बंगाल का गर्वनर वारेन हेस्टिंग्स इस सन्धि की शर्तों से संतुष्ट न था वह गुस्से में चिल्ला पड़ा ’’कि मैकार्टनी कैसा आदमी है इससे उसको कुछ भी फायदा न होगा’’ इस सन्धि के द्वारा दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए क्षेत्रों के वापस कर दिया। यह सन्धि टीपू के लिए कूटनीतिक सफलता थी क्योंकि वह अंग्रेजों के साथ पृथक सन्धि और मराठें की सर्वोच्चता स्वीकार करने का सफल विरोध कर सका था।
हैदर का मूल्यांकन:-हैदर दक्षिण भारत का पहला शासक था जिसने अंग्रेजों को पराजित किया उसने एक योग्य प्रशासन भी स्थापित किया इसके केन्द्रीय शासन में 18 विभाग थे जिसमें हिन्दू मन्त्रियों की संख्या भी थी। उसने मैसूर के चामुण्डेश्वरी देवी के मन्दिर को दान दिया था। उसके सोने तथा ताँबें के सिक्कों पर शिव-पार्वती तथा विष्णु की मूर्तियां अंकित थी उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से डिंडीगुल में 175

5 ई0 में एक आधुनिक शस्त्रागार स्थापित किया।

तृतीय-आंग्ल मैसूर युद्ध (1790-92)

इस युद्ध में मराठे और निजाम अंगे्रजी की तरफ थे। इस युद्ध का मूल कारण टीपू का फ्रांसीसियों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास था। इसकी शुरुवात तब हुई जब टीपू ने ट्रावलकोर पर आक्रमण किया। परन्तु इस युद्ध में टीपू की पराजय हुई अतः टीपू को श्री रंगपट्टम की सन्धि करनी पड़ी।
श्री रंगपट्टम की सन्धि (1792):- इस सन्धि के द्वारा टीपू को अपना आधा राज्य तथा तीन करोड़ रूपये अंग्रेजों को देने पड़े अंग्रेजों ने जीते हुए क्षेत्रों का मराठों और निजाम के बीच बंटवारा किया लेकिन अधिकांश क्षेत्र उन्होंने अपने पास ही रखे।

  • अंग्रेजों को प्राप्त क्षेत्र:-मालाबार, बारमहल, डिंडीगल, कुर्ग
  • मराठों को प्राप्त क्षेत्र:-उत्तर-पश्चिम में धारवाड़।
  • निजाम को प्राप्त क्षेत्र:-उत्तर पूर्व में कड़प्पा से कर्नूल तक।

    इस युद्ध के बाद कार्नवालिस ने टिप्पड़ी की ’’हमने अपने मित्रों को अधिक शक्तिशाली बनाये बिना ही अपने शत्रु को पर्याप्त रूप से लगंड़ा कर दिया है।’’

चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (1799)

टीपू लगातार फ्रांसीसियों से मित्रता करने को उत्सुक था उसने अरब काबुल कुस्तुनतुनिया और माॅरीशस में अपने राजदूत भेजे। वेलजली इससे असंतुष्ट था उसने टीपू के पास सहायक सन्धि का प्रस्ताव भेजा जिसको टीपू ने मानने से इन्कार कर दिया फलस्वरूप युद्ध प्रारम्भ हो गया चार मई 1799 को अपनी राजधानी श्री रंगपट्टनम के दुर्ग की रक्षा करते हुए टीपू मारा गया। अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का विभाजन कर दिया उन्होंने स्वयं कनारा कोयंम्बटूर, श्रीरंगपट्टम आदि क्षेत्र लिए  जबकि निजाम को गुरमोड चित्तल दुर्ग आदि क्षेत्र दिये गये। मराठों को उत्तर-पश्चिम के प्रदेश दिये गये जिसको लेने से उन्होंने इन्कार कर दिया। फलस्वरूप उसे अंग्रेजों और जिनामों ने आपस में बाँट लिया। शेष मैसूर राज्य बाडियार वंश के एक अल्प वयस्क राजकुमार को दे दिया गया।
    चतुर्थ मैसूर युद्ध में अपनी विजय के बाद बेल्जली ने टिप्पणी की कि पूरब का राज्य ’’हमारे पेैरो के नीचे है’’।
टीपू का मूल्यांकन:-

  1. इसने श्री रंगपट्टनम में एक स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया।
  2. फ्रांसीसी क्रांति से सम्बन्धित जै कोबिनद क्लब का सदस्य बना।
  3. आधुनिक कैलेण्डर को लागू किया व नाप-तौल के आधुनिक पैमाने अपनाये।
  4. अरब काबुल, कुस्तुनतुनियां और माॅरीशस तक अपने राजदूत भेजे। 

आमेर

मिर्जा राजा सवाई जयसिंह (1688-1747)

    18वीं शताब्दी का सर्वश्रेष्ठ राजपूत शासक आमेर का सबाई जयसिंह था। इसे मिर्जा राजा की उपाधि मुगल शासक जहाँदार शाह जबकि सवाई की उपाधि फर्रुखसियार ने दी थी। जयसिंह एक विख्यात राजन्तो कानून निर्मता और सुधारक था परन्तु इस सबसे अधिक वह विज्ञान प्रेमी था उसने 1722 ई0 में गुलाबी नगरी जयपुर की स्थापना की। जयसिंह विख्यात खगोलशात्री था उसने दिल्ली जयपुर, उज्जैन वाराणसी और मथुरा में पर्ववेक्षक शालयें स्थापित की उसने सम-सारणीय का एक सेट तैयार किया जिसे-जिस मुहम्मद शाही कहा गया। उसने युक्लिड की रेखागणित का अनुवाद संस्कृत में कराया।
    जयसिंह एक समाज सुधारक थी था उसने एक कानून लागू करने की कोशिश की जिससे राजपूतों को अपनी लड़कियों की शादी में अत्याधिक खर्च करने के लिए मजबूर न होना पड़े।
संस्थापक-वीर दाऊद तथा उसके पुत्र अली मु0 खाँ
    रुहेल खण्ड राजय बरेली में स्थापित किया गया। यह उत्तर में कुमायूँ से लेकिन दक्षिण में गागा नदी तक फैल गयी।
फर्रुखाबाद:-संस्थापक- खाँ बगस
    यह रुहेल खण्ड से पूरब में कुछ ही दूर पर स्थित था बा

द में इसमें बुन्देलखण्ड तथा इलाहाबाद के क्षेत्र भी शामिल हो गया।