मूल कर्तव्य (भारतीय संविधान)

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मूल कर्तव्य

1950 में लागू किए गए भारतीय संविधान में नागरिकों के केवल अधिकारों का ही उल्लेख किया गया था, मूल कर्तव्यों का नहीं। लेकिन 1976 में संविधान में व्यापक संशोधन करते समय यह अनुभव किया गया कि संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए। अतः संविधान के चतुर्थ भाग के बाद भाग ’चतुर्थ अ’ जोड़ा गया, जिसमें मूल कर्तव्यों की व्यवस्था की गई है। ये 11 मूल कर्तव्य इस प्रकार हैं:
1. संविधान का पालन तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान:-भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
2. राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रेरक आदर्शों का पालन:- प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्वतन्त्रता के लिए हमारे राट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा:-प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाये रखे। इसे भारतीय नागरिकों के सर्वोच्च कर्तव्य की संज्ञा दी जा सकती है।

4. देश की रक्षा और राष्ट्र सेवा:- प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह देश की रक्षा करे और बुलाये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
5. भारत के लोगों में समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास:- भारत के सभी भागों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करे, जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध हैं। इस प्रकार दो कर्तव्यों का बोध कराया गया है: (i) समस्त भारतीयों के मध्य समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास और(ii) स्त्रियों का सम्मान करना।
6. समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा की रक्षा:-हमारी समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और संरक्षण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सभी प्राणियों के प्रति दया भाव:- प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव भी हैं रक्षा करे और उनका सम्वर्द्धन करे तथा प्राणी-मात्र के प्रति दयाभाव रखे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन का विकास:- प्रत्येक नागरिक की कर्तव्य है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार का भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा व हिंसा से दूर रहना:-प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे व हिंसा से दूर रहे।
10. व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्कर्ष का प्रयास:-प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रगति और उपलब्धि की नवीन ऊंचाइयों को छू सके।
11. जो माता-पिता व संरक्षक हों, वे छः से चैदह वर्ष के बीच की आयु के, यथास्थिति, अपने बच्चे अथवा पतित्र प्रतिवाल्य को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा।
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