महा काब्य युग (Ebie Age)

रामायण और महाभारत को आदि महाकाब्य अथवा आर्ष महाकाव्य माना जाता है इसमें महाभारत की शुरूआत पहले मानी जाती है लेकिन सर्वप्रथम रामायण पूरा हुआ।

रामायण:- महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित भारत का आदि महाकाव्य है। प्रारम्भ में इसमें 6000 श्लोक थे बाद में उनकी संख्या बढ़कर 12000 और अन्ततः 24000 हो गई। इस पुस्तक का अन्तिम रूप से संकलन गुप्त काल में माना जाता है। बाद में इस पुस्तक का अनुवाद अनेक भाषाओं में भी हुआ। बंगाल के शासक नुसरत शाह के समय में कृत्तिवास ने इसका बंगला में अनुवाद किया। इसी तरह चोल शासक कुलोत्सुंग तृतीय के समय में कम्बन ने तमिल भाषा में अनुवाद किया। आधुनिक काल में पेरियार ने बींसवी शताब्दी में तमिल भाषा में सच्ची रामायण लिखी। पेरियार का पूरा नाम ई0वी0 रामास्वामी नायकर है।

’महाभारत’

लेखक-वेद व्यास

महाभारत की प्रस्तावना में वेद व्यास ने लिखा है कि ’’ इस पुस्तक में जो कुछ भी है वह अन्य पुस्तकों में भी है परन्तु इस पुस्तक में जो कुछ नहीं है वह कहीं भी नही है।’’
महाभारत में कौरवों और पाण्डवों की कथा है महाभारत का संकलन धीमे-धीमे किया गया। प्रारम्भ में जब इसमें 8800 मंत्र थे तो इसे जय संहिता तथा जब इसमें 24000 मंत्र हुए तो इसे भारत और जब मंत्रों की संख्या 100000 हो गई तो इसे शत् सहस्त्री संहिता या महाभारतकहा गया।
महाभारत में कुल 18 पर्व हैं इसमें भीष्म पर्व का भाग गीता है। गीता में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है इसी पुस्तक में सर्वप्रथम अवतार के बाद का उल्लेख है। गीता कर्म, भक्ति प्रथा, ज्ञानकी त्रिवेणी है।
महाभारत का सर्वप्रथम तमिल भाषा में अनुवाद पेरुनदेवनार ने किया जबकि बंग्ला भाषा में अुनवाद अलाउद्दीन हुसैन शाह के समय में किया। (यह अनुवाद कुष्ण चरितम् के द्वारा हुआ था)

सूत्र काल (600 ई0पू0-300 ई0पू0)

  सामाजिक दशा:- वैदिक युग की समाप्ति के बाद सूत्र काल आता है। 600 ई0पू0 से 300 ई0पू0 के बीच का काल सूत्र काल है। इसी समय वैदिक और वैदिकोत्तर साहित्यों का संकलन किया गया।
सूत्रकाल में सामाजिक दशा में पहला परिवर्तन यह आया कि वर्ण जातियों में परिवर्तित हो गये अर्थात उनकी सामाजिक दशा अब जन्म से निर्धारित की जाने लगी। इस प्रकार इस काल में चार जातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शुरूआत होती है। पाणिनी ने इस शूद्रों को दो वर्गों निरवसित एवं अनिरवसित में बाँटा है। पाँचवी शताब्दी ई0पू0 में ही एक अस्पृश्य वर्ग चाण्डाल का उल्लेख मिलने लगा है। इनकी उत्पत्ति प्रतिलोम विवाहों (ब्राह्मण कन्या शूद्र पिता) के फलस्वरूप मानी गई है। निरवसित वर्ग भी धीरे-धीरे सामाजिक व्यवस्था से बहिष्कृत होता गया और उसकी दशा गिरकर चाण्डाल की हो गई। इस प्रकार अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप अनेक प्रकार की जातियों का उदय हुआ।

संस्कार: 

संस्कार का अर्थ है परिष्कार अथवा शुद्धिकरण इसके माध्यम से व्यक्ति को समाज के योग्य बनाया जाता था। संस्कारों का उल्लेख गृह सूत्रों में मिलता है। 16 संस्कार सबसे ज्यादा प्रचलित थे जो जन्म से पूर्व प्रारम्भ मृत्यु के बाद तक चलते थे।

संस्कारों की क्रमबद्ध श्रेणियां निम्नलिखित है-
जन्म पूर्व संस्कार
गपुंसी  
1.गर्भाधन
2.पुंसवन- पुल प्राप्ति के लिए किया गया संस्कार।
3. सीमान्तोनयन -इसमें स्त्री के बालों को ऊपर उठाया जाता था तथा मन्त्रोचरण किया जाता था जिसमें गर्भ में बच्चे की आदि वैदिक शक्तियों से रक्षा की जा सके।
जानानि  
4. जाति कर्म-जन्म के समय सम्पादित किया गया संस्कार
5. नामकरण।
6. निष्कर्मण-प्रथम बार घर से निकालने पर
अचूक  
7. अन्न पसान
8. चूड़ाकर्म या मुंडन
9. कर्ण भेदन
विउ  
10. विद्यारम्भ
11. उपनयन- इस संस्कार के बाद ही बालक द्विज कहलाता था इस संस्कार के द्वारा बालक को यज्ञनोपवीत धारण कराया जाता था। उपनयन संस्कार मुख्यतः शिक्षा से सम्बन्धित था।
वेकेश  
12. वेदारम्भ
13. केशान्त
14. समावर्तन-यह संस्कार गुरू द्वारा सम्पादित होता था। गुरुकुल में शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् विद्यार्थी के घर लौटने से पहले यह संस्कार विद्यार्थी के घर लौटने से पहले यह संस्कार सम्पन्न होता था और विद्यार्थी स्नातक कहलाता था।

विवाह:

हिन्दू धर्म में विवाह को एक संस्कार माना जाता है। गृह सूत्र में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन प्राप्त होता है ये निम्नलिखित हैं-

  1. ब्रह्म विवाह: यह आधुनिक विवाह का रुप था इसमें पिता वर को अपने घर बुलाकर कन्या सौंप देता था।
  2. दैव विवाह: इस विवाह में कन्या का पिता एक यज्ञ का आयोजन करता था और यज्ञ करने वाले पुरोहित से अपनी कन्या का विवाह कर देता था। धार्मिक दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण माना जाता था।
  3. आर्ष विवाह: इस विवाह में वर पक्ष वधू पक्ष को एक जोड़ी गाय या बैल देता था।
  4. रजापत्य: यह ब्रह्म विवाह की ही तरह था इसमें पिता वर वधू को आदेश देता था कि धर्मानुकूल अपने जीवन को बितायें।
  5. असुर: यह विक्रय विवाह था इसमें पिता वर से कन्या का मूल्य लेकर उसे बेंच देता था।
  6. गान्धर्व विवाह: यह आधुनिक प्रेम विवाह था इसमें माता-पिता को जानकारी नही होती थी। स्वयंबर विवाह गान्धर्व का एक विशेष रूप था।
  7. राक्षस: इसे अपहरण विवाह भी कहा जाता था इसका क्षत्रियों में विशेष प्रचलन था। कृष्ण और पृथ्वीराज के विवाह इसके उदाहरण हैं।
  8. पिशाच: यह विवाह का सबसे निकृष्ट रूप था। इसमें बलात्कार आदि करके कन्या का विवाह कर लिया जाता था।

ऊपर के चार विवाह शास्त्र सम्मिलित थे जबकि असुर, गन्धर्व, राक्षस एव पैशाच को शास्त्रकारों ने मान्यता नहीं दी।