भारतीय नागरिकता

नागरिकता मनुष्य की उस स्थिति का नाम है, जिसमें मनुष्य को नागरिक का स्तर प्राप्त होता है और नागरिक केवल ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जा सकता है जिन्हें राज्य की ओर से सभी राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्रदान किये गये हों, और जो उस राज्य के प्रति विशेष भक्ति रखते हों। नागरिक के उपर्युक्त लक्षण को दृष्टि में रखते हुए ही हमारे संविधान में नागरिकता सम्बन्धी कुछ बातों का उल्लेख किया गया है।
भारतीय नागरिकता के कुछ विशेश लक्षण
भारतीय संविधान द्वारा नागरिकता के सम्बन्ध में जो व्यवस्था की गयी है, उसके कुछ विशेष लक्षण इस प्रकार हैं:
(1) इकहरी नागरिकता:-सामान्यतया संघात्मक शासन व्यवस्था में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की जाती है: प्रथम, संघ की नागरिकता और द्वितीय, राज्य की नागरिकता। भारतीय संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी है, किन्तु अमरीका आदि अन्य संघ राज्यों की भांति भारत में दोहरी नागरिकता की नहीं वरन् एक ही नागरिकता (भारतीय नागरिकता) की व्यवस्था की गयी है।
(2) नागरिकता संघीय विषय:-भारतीय संविधान के अनुसार नागरिकता एक संघीय विषय है और राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में कार्य करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। नागरिकता के सम्बन्ध में नियम बनाने और उन्हें संचालित करने का अधिकार केन्द्रीय संसद को ही प्राप्त है।

(3) नागरिकता के सम्बनध में अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण:- साधारणतया अन्य देशों में नागरिकता प्रदान करने के सम्बन्ध में या तो जन्म के सिद्धान्त को अपनाया जाता है अथवा वंश या रक्त के सिद्धानत को, किन्तु भारतीय संविधान के अन्तर्गत नागरिकता प्रदान करने के सम्बन्ध में जन्म के सिद्धान्त और वंश के सिद्धान्त दोनों को ही अपनाया गया था। 1985 तक व्यवस्था यह थी कि 26 जनवरी, 1950 के बाद जो व्यक्ति भारत भूमि पर उत्पन्न हुए हों या जो व्यक्ति चाहे भारत के बाहर उत्पन्न हुए हों, किन्तु जिनके माता-पिता भारत के नागरिक हों, भारत के नागरिक समझे जायेंगे। यह सोचा जा रहा था कि नागरिकता सम्बन्धी इन उदार प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा सकता है। अतः ’नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986’ के आधार पर अब यह व्यवस्था की गयी है कि इस देश में जन्म लेने वाले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता तभी प्राप्त होगी, जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक होगा। इस प्रकार नागरिकता के सम्बनध में प्रमुख रूप से वंश के सिद्धान्त को अपनाया गया है। नागरिकता के सम्बन्ध में यह व्यवस्था ही व्यावहारिक है।
संविधान लागू होने के समय
नागरिकता की व्यवस्था

भारतीय संविधान के 5 से 11 तक के अनुच्छेदों में नागरिकता सम्बन्धी व्यवस्था की गयी है। संविधान अग्रांकित श्रेणी के व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करता है:
(1) जन्मजात नागरिक:-संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी, 1950 ई.) निम्न तीन श्रेणियों के व्यक्ति भारत के जन्मजात नागरिक माने गये:
प्रथम श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारत भूमि में पैदा हुए हों,
दूसरी श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जिनके माता-पिता या इन दोनों में से कोई एक भारत की भूमि में पैदा हुए हों, तथा
तृतीय श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारतीय संविधान के घोषित होने के पूर्व कम-से-कम 5 वर्ष से भारत भूमि पर निवास कर रहे हों।
(2) शरणार्थी नागरिक:-संविधान में उन व्यक्तियों की नागरिकता का भी विवेचन किया गया है जो पाकिस्तान से भारत आये हैं। संविधान के अनुसार वे व्यक्ति जो 19 जुलाई, 1948 के पूर्व पाकिस्तान से भारत आये हैं, भारत के नागरिक समझे जायेंगे। जो व्यक्ति 19 जुलाई, 1948 के बाद पाकिस्तान से भारत आये और जिन्होंने भारत में कम-से-कम 6 मास रहने के बाद उचित अधिकारी के समक्ष नागरिक बनने के लिए प्रार्थना-पत्र देकर संविधान लागू होने के पूर्व अपना नाम रजिस्टर्ड करा लिया, उन्हें भी नागरिकता का अधिकार प्रदान कर दिया गया।
1 मार्च, 1947 के बाद जो व्यक्ति भारत से पाकिस्तान चले गये हैं, सामान्यतया उन्हें भारतीय नागरिकता से वंचित कर दिया गया है, लेकिन इनमें से भी उन लोगों को, जो भारत में स्थायी निवास का परमिट लेकर पाकिस्तान से भारत में चले आये हैं, 6 महीने भारत में रहने के बाद प्रार्थना-पत्र देकर रजिस्टेªशन करवा लेने पर भारत की नागरिकता मिल सकती है।
(3) विदेशों में रहने वाले भारतीय:-विदेशों में जो भारतीय रहते हैं, यदि वे निम्न दो शर्तें पूरी करते हों तो भारतीय नागरिक बन सकते हैं: ;पद्ध उनका या उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो, ;पपद्ध उन्होंने विदेश में स्थित भारतीय राजदूत के पास भारत का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र देकर अपना नाम रजिस्टर में लिखा लिया हो।
संविधान लागू होने के बाद नागरिकता की व्यवस्था
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955

हमारे संविधान ने संसद को यह अधिकार दिया है कि वह भारतीय नागरिकता से सम्बन्धित सभी विषयों के सम्बन्ध में व्यवस्था करे। अतः संसद ने 1955 ई0 में ’भारतीय नागरिकता अधिनियम’ पारित किया। इस अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय नागरिकता की प्राप्ति किस प्रकार होगी तथा किन परिस्थितियों में भारतीय नागरिकता का अन्त हो जाएगा।
नागरिकता की प्राप्ति:-उपर्युक्त अधिनियम के अनुसार निम्न में से किसी एक आधार पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है:
(1) जन्म से-प्रत्येक व्यक्ति जिसका जन्म संविधान लागू होने अर्थात् 26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत में हुआ हो वह जन्म से भारत का नागरिक होगा। (कुछ अपवादों जैसे राजनयिकों तथा शत्रु विदेशियों के बच्चे भारत के नागरिक नहीं माने जायेंगे)।
(2) रक्त सम्बन्ध या वंशाधिकार से-26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत के बाहर जन्मा कोई भी व्यक्ति, कतिपय अपेक्षाओं के अधीन रहते हुए भारत का नागरिक होगा, यदि उसके जन्म के समय उसकी माता या पिता भारत का नागरिक था।
(3) पंजीकरण द्वारा-निम्न श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं:
;पद्ध    ऐसे व्यक्ति जो 26 जुलाई, 1947 के बाद पाकिस्तान से आए हैं, उस दशा में भारतीय नागरिक माने जायेंगे जब वे आवेदन-पत्र देकर अपना नाम ’भारतीय नियुक्ति अधिकारी’ के पास नागरिकता के रजिस्टर में दर्ज करा लें। परन्तु ऐसे लोगों के लिए शर्त यह होगी कि आवेदन-पत्र देने से पूर्व कम-से-कम 6 माह से भारत में रहते हों तथा उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो।

  1. ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गए हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  2. विदेशी स्त्रियां, जिन्होंने भारतीय नागरिकों से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  3. भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चे।
  4. राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी कर रहे हों। आवेदन पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

(4) देशीकरण द्वारा-विदेशी नागरिक भी निम्न शर्तों को पूरा करने पर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं:

  1. वह किसी ऐसे देश का नागरिक न हो जहां भारतीय देशीयकरण द्वारा नागरिक बनने से रोक दिए जाते हों।
  2. वह अपने देश की नागरिकता का परित्याग कर चुका हो और केन्द्रीय सरकार को इस बात की सूचना दे दी हो।
  3.  वह आवेदन देने के पूर्व कम-से-कम एक वर्ष से लगातार भारत में रह रहा हो
  4. वह उपरोक्त एक वर्ष से पहले कम-से-कम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो या भारत सरकार की नौकरी में रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष हो पर किसी हालत में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  5. उसका आचरण अच्छा हो।
  6. वह भारत की किसी प्रादेशिक भाषा या राजभाषा का अच्छा जानकार हो।

संविधान में ऐसे व्यक्ति को विशेष छूट दी गई है जो दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य विश्वशान्ति या मानव विकास के क्षेत्र में विशेष कार्य कर चुका हो। उपरोक्त श्रेणी के व्यक्तियों को संविधान में निर्दिष्ट शर्तों को पूरा किए बिना भी नागरिकता प्रदान की जा सकती है।
(5) भूमि विस्तार द्वारा-यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई0 में गोवा को भारत में शामिल किए जाने पर वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गई।
नागरिकता का अन्त
भारत नागरिकता का अन्त निम्न प्रकार से हो सकता है:
(1) नागरिकता परित्याग करने से:-यदि कोई वयस्क व्यक्ति भारतीय नागरिकता के परित्याग की घोषणा करता है तो वह घोषणा विशेष अधिकारी द्वारा पंजीकृत कर ली जायेगी और वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहेगा। इसके साथ ही उस व्यक्ति के नाबालिग बच्चों की भारतीय नागरिकता भी समाप्त हो जायेगी।
(2) स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेने से :- यदि भारत का कोई नागरिक पंजीकरण देशीयकरण या अन्य किसी प्रकार से किसी दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो ऐसी स्थिति में वह भारत का नागरिक नहीं रहेगा।
(3) संघ सरकार द्वारा नागरिकता का अपहरण:- भारत की संघ सरकार निम्नलिखित कारणों के आधार पर नागरिकता का अपहरण कर सकती है:

  1. असत्य अभिलेख:-यदि किसी व्यक्ति ने धोखा देकर या गलत बयान देकर या आवश्यक बातों को छिपाकर नागरिकता प्राप्त कर ली है तो सही जानकारी प्राप्त होने पर उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  2. देशद्रोह से:-यदि किसी व्यक्ति ने भारत के प्रति देशद्रोह किया है, या युद्ध के समय शत्रु की सहायता की है।
  3. दीर्घ प्रवास से:-यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार की अनुमति के बिना लगातार सात वर्ष तक विदेश में रहे और विदेश के भारतीय दूतावास में अपनी भारतीय नागरिकता बनाये रखने की इच्छा से प्रतिवर्ष पंजीकरण भी न कराये तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  4. अपराध से:- यदि किसी व्यक्ति ने पंजीकरण या देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त की है और नागरिकता प्राप्त करने के पांच वर्ष के भीतर किसी देश में उसे कम-से-कम दो वर्ष की सजा हुई है, तो उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।

संघ सरकार किसी व्यक्ति की नागरिकता का अन्त करे, इसके पहले उसे अपनी सफाई देने का पूरा अवसर दिया जायेगा।
राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता:-नागरिकता अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता यह है कि राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के नागरिकों को भारत की राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता प्राप्त होगी। केन्द्रीय सरकार पारस्परिक के आधार पर राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिकों को भारतीय नागरिकता के कुछ अधिकार प्रदान कर सकती है।
नागरिकों को प्राप्त विशेषाधिकार
(नागरिकता का महत्व)
निम्नलिखित मूल अधिकार और अधिकार संविधान में केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं:
(1) राज्य नागरिकों के बीच केवल मूल वंश जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा-अनुच्छेद 15
(2) राज्य द्वारा प्रदत्त नौकरियों के विषय में अवसर की समानता का अधिकार-अनुच्छेद 16
(3) अनुच्छेद 19 में उल्लिखित मूल स्वतन्त्रताएं, जैसे भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा, संघ, आवास, सम्पत्ति तथा पेशे की स्वतन्त्रता।
(4) अनुच्छेद 29 एवं 30 द्वारा प्रदत्त सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार।
(5) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यपाल, महान्यायवादी, महाधिवक्ता, आदि पद केवल नागरिकों द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं।
(6) केन्द्रीय विधानमण्डल और राज्य विधानमण्डलों के प्रतिनिधियों के चुनने का मताधिकार और इन संस्थाओं के सदस्य बनने के अधिकार केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं।
(7) भारत में इन अधिकारों के साथ नागरिकों के कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं।

image_pdfimage_print

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *