19वीं, 20वीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक-सुधार आंदोलन

प्रारम्भिक 19वीं शताब्दी:-स्वामी सहजानंद (1781-1830)

इनका वास्तविक नाम ज्ञानश्याम था, गुजरात में स्वामी नारायण संप्रदाय की स्थापना की जो ईश्वरवाद में विश्वास करता है और उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए आचार संहिता निर्धारित की।

1772-1833:-राजा राममोहन राय-

बर्दवान जिले (पश्चिम बंगाल) के राधानगर में 1772 में जन्म, एकेश्वरवाद का प्रचार करने तथा हिन्दु समाज में सुधार करने की दृष्टि से 1815 में कलकत्ता में आत्मीय सभी की स्थापना की। बाद में आत्मीय सभा को ब्रह्म सभा नाम दिया गया और 1828 में अंततः ब्रह्म समाज बना। उन्होंने अपने पत्र संवाद कौमुदी के माध्यम से सती प्रथा के उन्मूलन के लिए आंदोलन (1819) चलाया।
1817-1905:-देवेन्द्र टैगोर ने राजाराम राय के बाद ब्रह्म समाज का नेतृत्व संभाला। 1839 में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की और राजाराम मोहन राय के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक बंगाली मासिक तत्वबोधिनी पत्रकिा का प्रकाशन किया। 1859 में ’तत्वबोधिनी सभा’ को ब्रह्म समाज में मिला लिया गया। उन्होंने उपनिषदों को चुने हुए अंशों का संकलन किया जिसे ’ब्रह्म धर्म’ के नाम से जाना गया।

1838-1884:-केशव चंद्र सेन देवेन्द्र नाथ टैगोर की अनुपस्थिति में ब्रह्म समाज के नेता थे। महिलाओं के लिए एक बामाबोधिनी पत्रिका आरंभ की। उनहोंने आमूल सुधारवादी आंदोलन जैसे जातिसूचक नाम न लगाना, अंतरजातीय और विधवा विवाह आदि का प्रचार किया और बाल विवाह के विरूद्ध आंदोलन चलाया। इन आमूल सुधारों से ब्रह्म समाज में पहला विभाजन हुआ-मूल ब्रह्म समाज, आदि ब्रह्म समाज के नाम से जाना गया और दूसरे भारतीय ब्रह्म समाज जिसकी स्थापना केशव चंद्रसेन द्वारा 1867 की गई। सेन ने 1870 में ’भारतीय सुधार संघ’ ;प्दकपंद त्मवितउ ।ेेवबपंजपवदद्ध की स्थापना की, जिसने ब्रिटिश सरकार को 1872 के देशी विवाह अधिनियम (सामान्यतया नागरिक विवाह अधिनियम-सिविल मैरिज एक्ट के नाम से भी प्रसिद्ध) पारित करने के लिए प्रेरित किया। इस अधिनियम में ब्रह्म विवाहों को कानूनों मान्यता दी गई और लड़के और लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र निर्धारित की गई।

1823-1898:-डाॅ. आत्माराम पाण्डूरंग ने बंबई 1867 में प्रार्थना समाज की स्थापना की। एम.जी. रानाडे, 1870 में इसके सदस्य बने।

1824-1883:-स्वामी दयानंद सरस्वती-वास्तविक नाम मूलशंकर, ने 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की तथा सत्यार्थ प्रकाश (हिन्दी में) और वेद भाष्य भूमिका (अंततः हिन्दी में और अंशतः संस्कृत में) लिखी।

1882:- एक रूसी महिला मैडम एच.पी. ब्लावत्स्की (1831-91) और एक रूसी अमरीकी कर्नल एच.एस. आॅलकाॅट (1832-1907) ने न्यूयार्क में 1875 में थियोसाॅफिकल सोसायटी की स्थापना की किन्तु 1882 में सोसायटी के मुख्यालय को मद्रास के निकट आड्यार में स्थानान्तरित कर दिया।

1863-1902:-स्वामी विवेकानन्द (वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त) ने समाज सेवा संघ (Social Service League) के रूप में 1887 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। जिसे 1898 में एक न्यास के रूप में पंजीकृत किया गया।

पुर्नजागरण आन्दोलन:-राजा राम मोहन राय: इस जागरण के मुख्य नेता राजा राममोहन राय थे जिन्हें आधुनिक भारत का प्रथम नेता मानना एकदम उचित है। अपने देश और जनता के प्रति गहरे प्रेम से प्रेरित होकर आजीवन उसके सामाजिक, धार्मिक, बौद्धिक और राजनीतिक नवोत्थान के लिए राममोहन राय ने कठिन परिश्रम किया। समसामयिक भारतीय समाज की जड़ता और भ्रष्टाचार से उन्हें काफी कष्ट हुआ। उस समय भारतीय समाज में जाति और परंपरा का बोलबाला था। लोकधर्म अंधविश्वासों से भरा हुआ था। इसका फायदा अज्ञानी लोग और भ्रष्ट पुरोहित उठाते थे। उच्च वर्ग के लोग स्वार्थी थे और उन लोगों ने अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए सामाजिक हितों की बलि दी। राममोहन राय के मन में प्राच्य दार्शनिक विचार-धाराओं के प्रति गहन प्रेम और आदर था। लेकिन वे यह भी सोचते थे कि केवल पश्चिमी संस्कृति से ही भारतीय समाज का पुनरूत्वान संम्भव था।  खासतौर पर वे चाहते थे कि उनके देश के लोग विवेकशील दृष्टि और वैज्ञानिक सोच अपनाएं तािा नर-नारियों की मानवीय प्रतिष्ठा और सामाजिक समानता के सिद्धांत को स्वीकार कर लें। वे वह भी चाहते थे कि देश में आधुनिक पूंजीवादी उद्योग आरंभ किए जाएं।

राममोहन राय प्राच्य और पाश्चात्य चिंतन के संश्लिष्ट (मिले-जूल) रूप के प्रतिनिध थे। वे विद्वान थे और संस्कृति, फारसी, अरबी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, ग्रीक और हिब्रू संहित एक दर्जन से अधिक भाषाएं जानते थे। युवावस्था में उनहोंने वाराणसी से संस्कृत में साहित्य और हिंदू दर्शन तथा पटना में कुरान और फारसी तथा अरबी साहित्य का अध्ययन किया था। वे जैन धर्म और भारत के अन्य धार्मिक आंदोलनों तथा पंथों से अच्छी तरह परिचित थे। बाद में उन्होंने पाश्चात्य चिंतन और संस्कृति का गहरा अध्ययन किया। मूल बाइबिल का अध्ययन करने के लिए उन्होंने ग्रीक और हिब्रू भाषाएं सीखीं। उन्होंने 1809 में फारसी में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’’बकेश्वरवादियों को उपहार’’ (Gift to Monotheists) लिखी जिसमें उन्होंने अनेक देवताओं में विश्वास के विरूद्ध और एकेश्वरवाद के पक्ष में वजनदार तर्क दिए।  वे 1814 में कलकत्ता में बस गए और उन्होंने जल्द ही नौजवानों के एक समूह को अपनी ओर आकर्षित कर लिया जिनके सहयोग से उन्होंने आत्मीय सभा आरंीा की। तब से लेकर जीवन भर बंगाल के हिंदुओं में प्रचलित धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उन्होंने एक जोरदार संघर्ष चलाया। विशेष रूप से उन्होंने मूर्तिपूजा, जाति की कट्टरता और निरर्थक धार्मिक कृत्यों के प्रचलन का जोरदार विरोध किया। इन रिवाजों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने पुरोहित वर्ग की निदंा की। उनकी धारणा थी कि सभी प्रमुख प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों ने एकेश्वरवाद की शिक्षा दी है। अपने दावे को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने वेदों और पांच प्रमुख उपनिषदों के बंगला अनुवाद प्रकाशित किए। उन्होंने एकेश्वरवाद के समर्थन में कई पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं।

यद्यपि अपने दार्शनिक विचारों के समर्थन में उन्होंने प्राचीन विशेषज्ञों को उद्वत किया तथापित अंततोगत्वा उन्होंने मानवीय तर्क शक्ति का सहारा लिया जो, उनके विचार से, किसी सिद्धांत-प्राच्य या पाश्चात्य की सच्चाई की अंतिम कसौटी है। उनकी धारणा थी कि वेदांत-दर्शन मानवीय तर्क शक्ति पर आधारित है। किसी भी स्थिति में आदमी को तब पवित्र ग्रंथों, शस्त्रों और विरासत में मिली परंपराओं से हट जाने में नहीं हिचकिचाना चाहिए जब मानवीय तर्क शक्ति का वैसा तकाजा हो और वे परंपराएं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही हो। इस बात का उल्लेख जरूरी है कि राममोहन राय ने अपने विवेकशील दृष्टिकोण का प्रयोग केवल भारतीय धर्मों और परंपराओं तक ही सीमित नहीं रखा। उससे उनके अनेक ईसाई धर्मप्रचारक मित्रों को निराशा हुई उन्होंने उम्मीद लगाई थी कि हिंदू धर्म की विवेकशील समीक्षा उन्हें ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित करेगी। राममोहन राय ने ईसाई धर्म, विशेषकर उसमें निहित अंध आस्था के तत्वों को भी विवेक शक्ति के अनुसार देखने पर जोर दिया। उन्होंने 1820 में ’प्रीसेप्ट्स आॅफ जीसस’ नाम की पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने न्यु टेस्टामेंट’ के नैतिक और दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारी कहानियों से अलग करने की कोशिश की। उन्होंने ’न्यु टेस्टामेंट’ के नैतिक और दार्शनिक संदेश की प्रशंसा की। वे चाहते थे कि ईसा मसीह के उच्च नैतिक संदेश को हिंदू धर्म में समाहित कर लिया जाए। इससे ईसाई धर्म प्रचारक उनके विरोधी बन गए।

इस प्रकार राममोहन राय का मानना था कि न तो भारत के भूतकाल पर आंखें मूंदकर निर्भर रहा जाए और न ही पश्चिम का अंधानुकरण किया जाए। दूसरी ओर, उन्होंने ये विचार रखे कि विवेक बुद्धि का सहार लेकर नए भारत को सर्वोत्तम प्राच्य और पाश्चात्य विचारों को प्राप्त कर संजो रखना चाहिए। अतः उन्होंने चाहा कि भारत पश्चिमी देशों से सीखें, मगर सीखने की यह क्रिया एक बौद्धिक और सर्जनात्मक प्रक्रिया हो जिसके द्वारा भारतीय संस्कृति और चिंतन में ज्ञान डाल दी जाएं। इस प्रक्रिया का अर्थ भारत पर पाश्चात्य संस्कृति को थोपना नहीं हो। इसलिए वे हिंदू धर्म में सुधार के हिमायती और हिंदू धर्म की जगह ईसाई धर्म लाने के विरोधी थे। उन्होंने इसाई धर्म प्रचारकों की हिंदू धर्म और दर्शन पर अज्ञानपूर्ण आलोचनाओं का जवाब दिया। साथ ही उन्होंने अन्य धर्म के प्रति अत्यंत मित्रतापूर्ण रूख अपनाया। उनका विश्वास था कि बुनियादी तौर पर सभी धर्म एक ही संदेश देते हैं कि उनके अनुयायी भाई-भाई हैं।

जिंदगी पर राममोहन राय को अपने निडर धार्मिक दृष्टिकोण के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। रूढ़िवादियों ने मूर्ति पूजा की आलोचना तथा ईसाई धर्म और इस्लाम की दार्शनिक दृष्टिकोण से प्रशंसा करने के कारण उनकी निंदा की। उन्होंने उनका सामाजिक तौर पर बहिष्कार किया। उनकी मां ने भी बहिष्कार करने वालों का साथ दिया। उन्हें विधर्मी और जाति बहिष्कृत कहा गया।

उन्होंने 1828 में ब्रह्म सभा नाम की एक नई धार्मिक संस्था की स्थापना की जिसको बाद में ब्रह्मसमाज कहा गया। इसका उद्देश्य हिंदू धर्म को स्वच्छ बनाना और एकेश्वरवाद की शिक्षा देना था। नई संस्था के दो आधार थे, तर्क शक्ति और वेद तथा उपनिषद। उसे अन्य धर्मों की शिक्षाओं को भी समाहित करना था। ब्रह्मसमाज ने मानवीय प्रतिष्ठा पर जोर दिया, मूर्तिपूजा का विरोध किया तथा सती किया तथा सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों की आलोचना की।

राममोहन राय एक महान चिंतक थे, और कर्मठ व्यक्ति थे। राष्ट्र-निर्माण का शायद ही कोई पहलू था जिसे उन्होंने अछूता छोड़ा हो। वस्तुतः, जैसे उन्होंने हिंदू धर्म को अंदर रहकर सुधारने का काम आरंभ किया, वैसे ही उन्होंने भारतीय समाज के सुधार के लिए आधार तैयार किया। सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध उनके आजीवन जेहाद का सबसे बढ़िया उदाहरण अमानवीय सती प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन था। उन्होंने 1818 में इस प्रश्न पर जनमत खड़ा करने का काम आरंभ किया। एक और पुराने शास्त्रों का प्रमाण देकर दिखलाया कि हिंदू धर्म सती प्रथा के विरोध में था, दूसरी ओर उन्होंने लोगों की तर्कशक्ति, मानवीयता और दया भाव की दुहाई दी। वे कलकत्ता के शमशानों में जाते और विधवाओं के रिश्तेदारों से उनके आत्मदाह के कार्यक्रम को त्याग देने के लिए समझाते-बुझाते। उन्होंने समान विचार वाले लोगों को संगठित किया जो इन कृत्यों पर कड़ी निगाह रखें और विधवाओं को सती होने कि लिए मजबूर करने की हर कोशिश को रोंके। जब रूढ़िवादी हिंदुओं ने सांसद को याचिका दी की वह सती प्रथा पर पाबंदी लगाने संबंधी बैंटिक की कार्रवाही को मंजूरी न दे तब उन्होंने बैटिंक की कार्यवाही के पक्ष में प्रबुद्ध हिंदुओं की ओर से एक याचिका दिलवाई।
ये औरतों के पक्के हिमायती थे। उन्होंने औरतों की परवशता की निंदा की तथा इस प्रचलित विचार का विरोध किया कि औरतें पुरुषों से बुद्धि में या नैतिक दृष्टि से निकृष्ट हैं। उन्होंने बहविवाह तथा विधवाओं की अवनत स्थिति की आलोचना की। औरतों की स्थिति को सुधारने और संपत्ति संबंधी अधिकार दिए जाएं।

राममोहन राय आधुनिक शिक्षा के सबसे प्रारंभिक प्रचारकों में से थे। वे आधुनिक शिक्षा को देश में आधुनिक विचारों के प्रचार का प्रमुख साधन समझते थे। डेविड हेअर ने 1817 में कलकत्ता में प्रसिद्ध हिंदु कालेज की स्थापना की। वह 1800 में एक घड़ीसाज के रूप में भारत आया था, मगर उसने अपनी सारी जिंदगी देश में आधुनिक शिक्षा के प्रचार में लगा दी। हिंदू कालेज की स्थापना और उसकी अन्य शिक्षा संबंधी परियोजनाओं के लिए राममोहन राय ने हेअर को अत्यंत जोरदार समर्थन दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कलकत्ता में 1817 से अपने खर्च से एक अंग्रेजी स्कूल चलया जिसमें अन्य विषयों के साथ ही यांत्रिकी ;डमबींदपबेद्ध और वाल्तेयर के दर्शन ही पढ़ाई होती थी। उन्होंने 1825 में कलकत्ता में एक वेदांत कालेज की स्थापना की जिसमें भारतीय विद्या और पाश्चात्य सामाजिक तथा भौतिक विज्ञानों की पढ़ाई की सुविधाएं उपलब्ध थी।

राममोहन राय बंगाल को बौद्धिक संपर्क का माध्यम् बनाने के लिए समान रूप से उत्सुक थे। उन्होंने बंगाल व्याकरण पर एक पुस्तक की रचना की। अपने अनुवादों पुस्तिकाओं तथा पत्र-पत्रिकाओं के जरिए बंगाल भाषा की एक आधुनिक और सुरूचिपूर्ण शैली विकसित करने में उन्होंने सहायता दी।
भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय की पहली झलक का राममोहन राय प्रतिनिधित्व करते थे। एक स्वतंत्र और पुनरूत्थानशील भारत का स्वप्न उनके चिंतन और कार्यों का मार्गदर्शन करता था। उनका विश्वास था कि भारतीय धर्मों और समाज से भ्रष्ट तत्वों को जड़मूल से उखाड़ फेंकने की कोशिश कर और एकेश्वरवाद का वैदांतिक संदेश देकर वे भिन्न-भिन्न समूहों में बंटे भारतीय समाज की एकता का आधार तैयार कर रहे हैं। उन्होंने जातिप्रथा की कट्टरता का विशेष रूप से विरोध किया, जो उनके अनुसार, ’’हमारे बीच एकता के अभाव का स्रोत रहा है।’’ उनका ख्याल था कि जातिप्रथा दोहरी कुरीति हैः उसने असमानता पैदा की है और जनता को विभाजित किया है और उसे ’’देशभक्ति की भावनाओं से वंचित रखा है।’’ इस प्रकार, उनके अनुसार धार्मिक सुधार का एक लक्ष्य राजनीतिक उत्थान था।

राममोहन राय भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत थे। जनता के बीच वैज्ञानिक, साहित्यिक और राजनीतिक ज्ञान के प्रचार, तात्कालिक दिलचस्पी के विषयों पर जनमत तैयार करने, और सरकार के सामने जनता की मार्गो और शिकायतों को देखने के लिए उन्होंने बंगाल, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी में पत्र-पत्रिकाएं निकालीं।

वे देश के राजनीतिक प्रश्नों पर जन-आंदोलन के प्रवर्तक भी थे। बंगाल के जमींदारो की उत्पीड़न कार्यवाइयों की उन्होंने निंदा की, जिन्होंने किसानों को दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया था। उन्होंने मांग की कि वास्तविक किसानों द्वारा दिए जाने वाले अधिकतम लगान को सदा के लिए निश्चित कर दिया जाना चाहिए जिससे वे भी 1793 के स्थायी बंदोबस्त से फायदा उठा सकें। उन्होंने लाखिराज ;तमदज.तिममद्ध जमीन पर लगान निर्धारित करने के प्रयासों के प्रति भी विरोध प्रकट किया। उन्होंने कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को खत्म करने तथा भारतीय वस्तुओं पर से भारी निर्यात शुल्कों को हटाने की भी मांग की और उच्च सेवाओं के भारतीयकरण कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक दूसरे से अलग करने जूरी के जरिए मुकदमों को सुनवाई और भारतीयों तथा यूरोपवासियों के बीच न्यायिक समानता की भी उन्होंने मांग की।

अंतर्राष्ट्रीयता और राष्ट्रों के बीच मुक्त सहयोग में राममोहन राय का पक्का विश्वास था। कृषि रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही लिखा है, ’’राममोहन अपने समय में, संपूर्ण मानव समाज में एक मात्र व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक युग के महत्व को पूरी तरह समझा। वे जानते थे कि मानव सभ्यता का आदेश अलग-अलग रहने में नहीं बल्कि चिंतन और क्रिया के सभी क्षेत्रों में व्यक्तियों तथा राष्ट्रों के आपसी भाई चारे में निहित है। ’’राममोहन राय ने अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में गहरी दिलचस्पी ली और हर जगह उन्होंने स्वतंत्रता, जनतंत्र और राष्ट्रीयता के आंदोलन का समर्थन तथा हर प्रकार के अन्याय, उत्पीड़न और जुल्म का विरोध किया। 1821 में नेपल्स में क्रांति की विफलता की खबर से वे इतने दुखी हो गए कि उन्होंने अपने सारे सामाजिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया। दूसरी ओर, स्पेनिश अमरीका में 1823 में क्रांति की सफलता पर उन्होंने एक सार्वजनिक भोज देकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। आयरलैंड की दूरस्थ जमींदारों के उत्पीड़न राज में दयनीय स्थिति की उन्होंने निंदा की। उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अगर संसद रिर्फाम बिल पास करने में असफल रही तो वे ब्रिटिश साम्राज्य छोड़कर चले जाएंगे।

सिंह की तरह राममोहन राय निडर थे। किसी उच्ति उद्देश्य का समर्थन करने में वे कभी नहीं हिचकिचाए। सारी जिंदगी व्यक्तिगत हानि और कठिनाई सहकर भी उन्होंने सामाजिक अन्याय और असमानता के खिलाफ संघर्ष किया। समाज सेवा करते हुए उनका बहुधा अपने परिवार, धनी जमींदार और शक्तिशाली धर्म प्रचारकों, उच्च अफसरों और विदेशी अधिकारियों से टकराव हुआ। मगर वे न तो कभी डरे और न कभी अपने अपनाएं हुए रास्ते से विचलित हुए।

उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में राममोहन राय भारतीय आकाश के सबसे चमकीले सितारे जरूर थे मगर वे अकेले सितारे नहीं थे। उनके अनेक विशिष्ट सहयोग, अनुयायी और उत्तराधिकारी थे। शिक्षा के क्षेत्र में डच घड़ीसीज डैविड हेअर और स्काटिश धर्म प्रचारक अलेक्जेंडर डफ् ने उनकी बड़ी सहायता की। अनेक भारतीय सहयोगियों में द्वारका नाथ टैगोर सबसे प्रमुख थे। उनके अन्य प्रमुख अनुयायी थे, प्रसन्न कुमार टैगोर, चन्द्रशेखर देव, और ब्रह्म सभा के प्रथम मंत्री ताराचंद चक्रवर्ती।