द्वितीय नगरीय क्रान्ति

IInd Urban Revolution

    नगरीय क्रान्ति शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम गार्डन चाइल्डस ने अपनी पुस्तक The Urban Revolution में किया है भारत में प्रथम नगरीय क्रान्ति सिन्धु सभ्यता के समय में हुई। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में द्वितीय नगरीय क्रान्ति के प्रमाण मिलते हैं। गार्डन चाइल्ड ने नगरीय क्रान्ति के लिए 10 तत्वों पर जोर दिया है जिनमे से कुछ निम्न हैं।

  1. शासक वर्ग का उदय।
  2. अधिशेष उत्पादन और अधिशेष का कर के रूप में शासक वर्ग द्वारा ग्रहण। 
  3. धार्मिक क्रिया-कलाप।
  4. मुद्रा का प्रचलन।
  5. व्यापार वाणिज्य का विकास।
  6. लिपि का विकास।

    – ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गंगा यमुना दोआॅब एवं बिहार के आस-पास के क्षेत्रों में उपरोक्त तथ्यों का प्रचलन दिखाई पड़ता है। बुद्ध काल में नगरों का तेजी से उदय हुआ प्रारम्भिक बौद्ध साहित्यों में बुद्ध के समय के 6 प्रसिद्ध नगरों का उल्लेख मिलता है। ये निम्नलिखित थे-

  1. चम्पा 
  2. राजगृह       
  3. श्रावस्ती  
  4. साकेत  
  5. कौशाम्बी
  6. वाराणसी

श्रेणी संगठन:  बुद्ध काल में व्यवसायियों ने अपने-अपने संगठन बना लिए थे इससे विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में दक्षता आयी इस समय के आर्थिक क्रिया-कलापों से सम्बन्धित कुछ शब्दों का उल्लेख तत्कालीन साहित्यों में मिलता है। उदाहरर्ण-

  1. रेणी: एक ही कार्य करने वाले लोगों के समूह को श्रेणी कहते हैं इसके प्रमुख को श्रेष्ठी अथवा श्रेष्ठिन कहा जाता है। एक अन्य नाम जेत्थक भी मिलता है।
  2. सार्थवाह: यह व्यापारियों का नेता होता था।
  3. भण्डारगारिक: ये एक अधिकारी थे जो विभिन्न श्रेणियों के बीच एकता बनाये रखने का कार्य करते थे।

सिक्के: सिक्के के अध्ययन को छनउपमे उंजपमे अथवा मुद्रा शास्त्र कहा जाता है। भारत के प्राचीनतम सिक्के आहत-सिक्के (Puneh marked ecoins) कहते हैं ये 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व अथवा छठी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं और मुख्यतः चाँदी (ताँबे के भी) के बने हुए है, इन्हें आहत इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन पर सूर्य, चन्द्र, पीपल, मछली आदि की आकृतियां खुदी हुई हैं। इन पर कोई लिखित सामग्री नहीं है। क्ण्क्ण् ज्ञंनेींउइीप महोदय ने आहत सिक्कों का अध्ययन किया है। प्राचीन बौद्ध साहित्यों में आहत सिक्के के लिए कर्षापण शब्द का उल्लेख मिलता है यह मूलतः चाँदी के सिक्के के लिए प्रयुक्त किया गया था। इस समय चाँदी का कर्षापण 180 ग्रेन (1 ग्रेन=0.118 ग्राम) की होती थी।
व्यापार एवं वाणिज्य:- गुप्त काल में व्यापार और वाणिज्य के प्रमाण प्राप्त होते हैं। भाबेरु जातक नामक बौद्ध ग्रन्थ में मध्य एशिया के निर्यात है इस समय व्यापारिक मार्ग पर अनेक नगर स्थित थे। जिसमें कम्बोज, कौशाम्बी, वाराणसी, श्रावस्ती आदि महत्व पूर्ण थे। कम्बोज से घोड़ों का आयात होता था जबकि वाराणसी बुद्ध युग में एक महान व्यापारिक केन्द्र था। इस समय के कुछ बन्दरगाह निम्नलिखित थे।

  1. भड़ौच अथवा भृगुकच्छ: खम्भात की खाड़ी पर स्थित भृंगु कच्छ भारत का सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा बन्दरगाह था पश्चिमी देशों से व्यापार के लिए अधिकाशतः इसी का उपयोग होता था। पेरिप्लस में इसका नाम बैरीगाजा मिलता है।
  2. सोपारा: वर्तमान महाराष्ट्र में स्थित पश्चिमी तट का यह प्रसिद्ध बन्दरगाह था।
  3. ताम्र लिखित: बंगाल प्रान्त में स्थित पूर्वी तट का सबसे प्रसिद्ध बन्दरगाह था।

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