ऋग्वैदिक संस्कृति एंव उत्तर वैदिक काल

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 ऋग्वैदिक संस्कृति (1500 ई0पू0 से 1000 ई0पू0)

आर्यों का मूल क्षेत्रः- ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों कुंभा काबुल, क्रुमू (कुर्रम) गोमद (गोमती) एवं सुवास्तु (स्वात) नदियों का उल्लेख मिलता है ऋग्वेद में ही सप्त सैंन्धव का उल्लेख है। यह पंजाब एवं सिन्धु के सात नदियों वाला क्षेत्र था। ये सातों नदियां थी-

  1. सिन्धु:-इस नदी का उल्लेख सबसे अधिक बार आया है।
  2. सरस्वती:- यह आर्यों की सबसे पवित्र नदी थी क्योंकि नदी सूक्त में इसे नदीतम कहा गया है।
  3. सतुद्री (सतलज)
  4. परुष्णवी (रावी)
  5. विपासा (ब्यास)
  6. अस्किनिल (चिनाव)
  7. वितस्ता (झेलम)

ऋग्वेद में कश्मीर की एक नदी मरुद्वृधा का उल्लेख है। ऋग्वेद में यमुना का तीन बार और गंगा का एक बार उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में पश्चिमी हिमालय की एक चोटी मूजवन्त का उल्लेख है जहाँ से ऋग्वैदिक आर्य सोम प्राप्त करते थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रारम्भिक आर्य लोग पंजाब एवं अफगानिस्तान के क्षेत्र में बसे थे। इस क्षेत्र को ब्रहमवर्त कहा गया।

उत्तर वैदिक क्षेत्र:- उत्तर वैदिक काल में आर्यों के प्रसार का वर्णन शतपथ ब्राहमण नामक ग्रन्थ में मिलता है। इसमें एक कथा का वर्णन है जिसके अनुसार विदेह माधव सरस्वती नदी के तट पर निवास कर रहे थे उन्होंने वैश्वानर अग्नि को मुख में धारण किया हुआ था। घृत का नाम लेते ही अग्नि उनके मँह से निकलकर पृथ्वी पर आ गिरा अग्नि आगे बढ़ते हुए जंगलों को नष्ट करने लगा उसके पीछे-पीछे विदेह माधव और उनके पुरोहित गौतम राहूगढ़ चलने लगे। अकस्मात् बिहार के सदानीरा (आधुनिक-गण्डक) नदी को यह अग्नि नही जला पाया। यही आर्यों की पूर्वी सीमा हो गयी। शतपथ ब्राह्मण में विध्यांचल पर्वत का उल्लेख उसी ग्रन्थ में रेवा (नर्मदा) नदी का उल्लेख है। अब पूर्वी हिमालय की चोटियों का पता चलने लगा इस प्रकार उत्तर वैदिक काल में आर्यों को सम्पूर्ण उत्तरी भाग का ज्ञान हो गया।

आर्य जब ब्रह्मवर्त से आगे बढ़े तब धीरे-धीरे उन्हें गंगा यमुना दोआब के क्षेत्रों की जानकारी हुई अब इस क्षेत्र को ब्रम्हर्षि देश कहा जाने लगा। जब आर्यों को विंध्याचल पर्वत और बिहार तट के क्षेत्रों की जानकारी हो गई तब इसे मध्य देश कहा गया। वैदिक युग के बाद नर्मदा के उत्तर में सम्पूर्ण भारत को आर्यावर्त से सम्बोधित किया गया।

वैदिक संस्कृति जानने के स्रोत:
1. पुरातात्विक साक्ष्य:-
(I)ऋग्वैदिक कालीन पुरातात्विक स्रोतः-

  1. लाल मृदभाण्डः- ये सर्वाधिक संख्या में प्राप्त हुए हैं।
  2. काले मृद भाण्ड:-
  3. ताम्र पुंन्ज:-
  4. गेरुवर्णी मृदभाण्ड (O.E.P)

ये सभी मृदभाण्ड प्राक्, लौह अवस्था या ऋग्वैदिक काल को द्योतित (इंगित) करता है।

उत्तर वैदिक कालीन पुरातात्विक साक्ष्य:-

  1.  P.G.W.(चित्रित धूसर मृदभाण्ड) Painted Grey ware
  2. उत्तरी काली पालिश वाले मृदभाण्ड:- ये मृदभाण्ड लौह अवस्था का संकेत करते हैं तथा उत्तर वैदिक युग से मिलने प्रारम्भ हो जाते हैं। इनका पूरा नाम है-Northern Black Pollieed ware है। परन्तु ये सर्वाधिक संख्या में मौर्य काल में पाये गये हैं।

साहित्यिक साक्ष्य

Vaidik Age

1. ऋग्वैदिक कालीन साहित्यिक साक्ष्य

Vaidik age
ऋग्वैदिक कालीन केवल एक वेद ऋग्वेद है। उसी से ऋग्वैदिक संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है। इसके तीन भाग है-बाल्खिल्य, साकल, पास्कल |
उत्तर वैदिक साहित्यिक साक्ष्य:- उत्तर वैदिक साहित्यिक साक्ष्यों में वेद-ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद आते हैं।

उत्तर वैदिक कालीन तीन प्रमुख वेद हैं।

  1. सामवेद:- साम का अर्थ है गायन इसमें ऋग्वैदिक मन्त्रों को कैसे गाया जाय का उल्लेख मिलता है। ये ऋग्वेद के अभिन्न माने जाते हैं।
  2. यजुर्वेद:- इसमें कर्मकाण्डों का वर्णन है। मात्र यही वेद गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है।
  3. अथर्ववेद:- इसे ब्रम्ह वेद भी कहते हैं इसमें लौकिक बातों का वर्णन है। प्रथम तीन वेद को (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद) त्र्यी कहा जाता है।
    • ब्राहमण:- ब्राहमण वेदों की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये भाग हैं। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राहमण हैं।
    • आरण्यक:- वेद के वे भाग जो जंगलों में लिखे गये हैं आरण्यक कहलाते हैं। इसमें आत्मा पुरुष आदि का उल्लेख मिलता है।
    • उपनिषद अथवा वेदांग:- ये वेदों के अन्तिम भाग हैं उप का अर्थ है नजदीक, निषद का अर्थ है बैठना अर्थात ये भाग गुरु के समीप बैठकर लिखे गये हैं। इसमें अनेक गूढ़ बातों जैसे-आत्मा और ब्रम्ह का विवेचन है।

    ऋग्वेद:- यह आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है इसमें कुल 10 मण्डल 1028 सूक्त (या 1017) एवं 10580 मंत्र हैं मंत्रों को ऋचा भी कहा जाता है। सूक्त का अर्थ है अच्छी उक्ति प्रत्येक सूक्त में 3 से 100 तक मंत्र या ऋचायें हो सकती है। वेदों का संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने किया है। इनका एक नाम वेद व्यास भी है। इन दशों (10) मण्डलों में 2 से 7 सबसे प्राचीन है जबकि 1,8, 9, 10 परवर्ती काल का है। प्रत्येक मण्डल और उससे सम्बन्धित ऋषि निम्नलिखित हैं।

    मण्डल               सम्बन्धित ऋषि

    प्रथम मण्डल      –   मधुच्छन्दा, दीर्घात्मा, अडिंग्रा
    द्वितीय मण्डल    –   गृत्समद
    तृतीय मण्डल     –   विश्वामित्र (गायत्री मंत्र इसी में है जो सूर्य या सविता देवता से सम्बन्धित हैं।
    चतुर्थ मण्डल      –   वामदेव (कृषि से सम्बन्धित)
    पाँचवा मण्डल    –   अत्रि
    छठा मण्डल       –   भरद्वाज
    सातवां मण्डल    –   वशिष्ठ (इसमें दशराज्ञ युद्ध का वर्णन है।
    आठवां मण्डल   –    कष्व ऋषि (इसी मण्डल में 11 सूक्तों का वाल्यखिल्य है।)
    नवां मण्डल       –    पवमान अंडिग्रा (सोम का वर्णन मै कवि हूँ ………)
    दशवां मण्डल    –    क्षुद्र सूक्तीय, महासूक्तीय नदी सूक्त

    ब्राह्मण:- ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं-1. ऐतरेय 2. कौशितकी

    1. ऐतरेय ब्राह्मण:- इस ब्राह्मण के रचयिता महीदास माने जाते हैं उनकी माँ का नाम इतिरा था इसीलिए उनके द्वारा लिखा गया ग्रन्थ का नाम ऐतरेय पड़ गया। इसे ब्राह्मण पंचिका भी कहा जाता है।
    2. कौशीतकी:- इसके लेखक कौशीतक माने जाते हैं।

    आरण्यकः- ऋग्वेद के दो आरण्यक ऐतरेय और कौशीतकी हैै।
    उपनिषद:- ऐतरेय और कौशीतकी।
    2. सामवेद:– यह दूसरा वेद है साम का अर्थ है गायन। इसमें मुख्यतः ऋग्वैदिक मंत्रों के उच्चारण पर बल दिया गया। इस वेद में कुल 1549 मन्त्र है। जिसमें इसके स्वयं के 75 मन्त्र ही है बाकी सब ऋग्वेद से लिए गये हैं। इसी कारण इसे ऋग्वेद का अभिन्न माना जाता है। इसी वेद में सा0 ……….. रे…………गामा………… का उल्लेख है। इसकी मुख्यतः तीन शाखाये हैं।
    1. कौथुम 2. राणायनीय 3. जैमनीय (तलवकार)

    ब्राहमण:- ताण्डय, षडविश, जैमिनीय

    1. ताण्डय ब्राहमण:- यह सबसे प्राचीन एवं सबसे बड़ा ब्राहमण है। इसीलिए इसे महाब्राह्मण भी कहते हैं। यह पाँच अध्यायों में विभाजित है। इसी कारण इसे पंचविष कहा जाता है।
    2. षडविश:- यह छः अध्यायों में विभाजित है इसमें भूत-पे्रत, अकाल आदि के शमन का विधान मिलता है। इसी कारण इसे अद्भुत् ब्राम्हण कहा जाता है।

    आरण्यक:- जैमिनीय, छान्दोग्य
    उपनिषद:- जैमिनीय, छान्दोग्य

    • छान्दोग्य:- यह सबसे प्राचीन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपनिषद माना जाता है। इसी उपनिषद में देवकी पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है तीनों आश्रमों का उल्लेख भी सर्वप्रथम इसी में है। इसी उपनिषद में उद्दालक अरूण और उनके पुत्र श्वेत केतु के बीच आत्मा और ब्रह्म के बीच अभिन्नता का विख्यात संवाद मिलता है।

    3. यजुर्वेद:- इस वेद का मुख्य विषय कर्मकाण्ड है मात्र यही वेद गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है यह 40 अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें कुल 1990 मन्त्र है इसकी दो मुख्य शाखायें हैं।

    1. शुक्ल यजुर्वेद    2. कृष्ण यजुर्वेद

    शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है।
    यजुर्वेद
    शुक्ल यजुर्वेद-वाजसनेयी संहिता

    1. काण्व
    2. मध्यन्दिन

    कृष्ण यजुर्वेद

    • काठक
    •  कपिष्ठल
    •   मैत्रीय
    •   तैतरीय

    वास्तविक यजुर्वेद शुक्ल यजुर्वेद को ही माना जाता है।
    ब्राह्मण:- शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण को शतपथ ब्राह्मण एवं कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण को तैतरीय ब्राह्मण कहा जाता है।

    (I) शतपथ ब्राह्मण:- यह अत्यन्त महत्वपूर्ण ब्राह्मण है इसके लेखक महर्षि याज्ञवल्क्य माने जाते हैं। इस ब्राह्मण में जलप्लावन कथा, पुन्र्जन्म का उल्लेख, पुरखा उर्वशी आख्यान एवं अश्विन कुमार द्वारा यवन ऋषि के यौवन दान आदि का उल्लेख मिलता है। (अश्विन को सांयकाल का तारा कहा जाता है)

    आरण्यकः-1.वृहदारण्यक अरण्यक 2. शतपथ आरण्यक 3. तैतरीय आरण्यक
    उपनिषदः-1. वृहदारण्यक उपनिषद 2. कठोप निषद 3. ईशापनिषद 4. श्वेताश्वतर उपनिषद 5. मैत्रायणी उपनिषद 6. महानारायणी उपनिषद

    कठोप निषदः- कठोप निषद में यम और नचिकेता का प्रसिद्ध संवाद है इसी उपनिषद में आत्मा को पुरुष कहा गया है।
    बृहदारण्यक उपनिषद:- इस उपनिषद में याज्ञवाल्क्य और गार्गी का प्रसिद्ध संवाद है। राजा जनक के दरबार में जब आत्मा और बह्मा की चर्चा चल रही थी तभी एक प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने गार्गी से कहा ’’आगे बोलोगी तो सर फोड़ दूँगा’’ इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल में महिलायें भी विदुषी होती थी परन्तु इसमें विदुषी पुत्री जन्म की कामना की गई है।- बृहदारणयक इसमें भी सीमा निर्धारित थीं।

    4. अथर्ववेद अथवा ब्रम्हवेद:-

    अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा इस वेद में कुल 20 अध्याय 731 सूक्त और 6000 मन्त्र हैं। इस वेद में जादू-टोना, वशीकरण, भूत-प्रेत आदि के मन्त्र तथा विभिन्न प्रकार की औषधियों का वर्णन है। लोक जीवन से सम्बन्धित विषयों का उल्लेख होने के कारण इसे बेदत्रीय में शामिल नही किया जाता है।

    ब्राह्मण:- गोपथ
    आरण्यक:- इस वेद का कोई आरण्यक नही है।
    उपनिषद:- मुण्डकोपनिषद 2. माण्डम्योपनिषद 3. प्रश्नोपनिषद

    • मुण्डकोप उपनिषद में सत्यमेव जयते का उल्लेख मिलता है। इसी उपनिषद में यज्ञों को टूटी हुई नवकाओं के समान बताया गया है जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता।

    नोट- तैत्तरीय उपनिषद में अधिक अन्न उपजाओं का उल्लेख है।

    वैदिकोत्तर साहित्य:- वैदिक युग के बाद वेदों को समझने में वैदिकोत्तर साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। इस साहित्य में मुख्यतः वेदांग और उपवेद आते हैं।

    वेदांगः- इन्हें वेद का अंग माना जाता है इनकी कुल संख्या छः है-

    1. शिक्षा:- यह उच्चारण शास्त्र से सम्बन्धित है। इसे स्वन विज्ञान भी कहा जाता है।
    2. कल्प:- कर्मकाण्ड से सम्बन्धित।
    3. व्याकरण:- इसका मुख्य कार्य भाषा को वैज्ञानिक शैली प्रदान करना है।
    4. निरुक्त:- इसमें शब्दों की व्युत्पत्ति बताई गयी है।
    5. छन्द:- पद्यों को चरणों में सूत्र बध्य करने के लिए छन्दों की रचना की गई इसे चतुण्पदीय वृद्ध भी कहा जाता है।
    6. ज्योतिष:- ब्रह्माण्ड एवं नक्षत्रों की भविष्यवाणी ज्योतिष का विषय है।

    उपवेदः- ये वेदों के भाग माने जाते हैं। चारों वेद के साथ ये अलग-अलग जुड़े हैं। जैसे ऋग्वेद का उपवेद-आयुर्वेद, सामवेद का उपवेद-गन्धर्ववेद यजुर्वेद का उपवेद-धनुर्ववेद, अथर्ववेद का उपवेद-शिल्प वेद।

    सूत्र साहित्य (600 ई0पू0-300 ई0पू0)

    वैदिक युग के समारित के बाद सूत्र साहित्य का संकलन किया गया इसके अन्तर्गत तीन प्रमुख सूत्र आते हैं।

    1. श्रौत सूत्र:- इस सूत्र में यज्ञ से सम्बन्धित जानकारी मिलती है इसी सूत्र का एक भाग शुल्व सूत्र है जिसके द्वारा यज्ञ वेदियों के निर्माण आदि का पता चलता है। इसी के द्वारा रेखा गणित की उत्पत्ति मानी जाती है।
    2. गृह सूत्र:- इसमें गृह कर्मकाण्डों एवं यज्ञों का वर्णन है जैसे- संस्कार आदि इसके रचयिता आश्वलायन हैं।
    3. धर्म सूत्र:- इसमें राजनैतिक सामाजिक धार्मिक कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। इससे सामाजिक व्यवस्था जैसे-वर्णाश्रम, पुरुषार्थ आदि की भी जानकारी मिलती है। इसके लेखक आपस्तम्ब माने जाते हैं प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, आपस्तम्ब, बौद्धायन, वशिष्ठ, आश्वलयन आदि हैं। जिनमें गौतम सूत्र सर्वाधिक प्राचीन है। वशिष्ठ सूत्र में नारी की दशा का वर्णन करते हुए वह प्रसिद्ध श्लोक है।

    ’’पिता रक्षति कौमारे।
    भर्ता रक्षति यौवने।
    रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रः।
    न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति’’।।

    स्मृतियां:- स्मृतियां हिन्दू धर्म के कानूनी ग्रन्थ हैं ये पद्य में लिखे गये हैं इन्हें अन्तिम रूप से गुप्त काल में संकलित किया गया है सबसे प्राचीन दो स्मृति मनु एवं याज्ञवल्क्य स्मृति है।

    1. मनु स्मृति – 200 ई0पू0 -200 ई0
    2. याज्ञवल्क्य – 100 ई0  – 300 ई0
    3. नारद स्मृति – 300 ई0 – 400 ई0
    4. पाराशर स्मृति- 300 ई0 – 500 ई0
    5. काव्यायन स्मृति – 400 ई0 – 500 ई0
    6. देवल स्मृति – 8 वीं ईसवी के बाद
    • देवल स्मृति में जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लिए थे उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में लौटने का विधान बताया गया है।

    याज्ञवल्क्य केभाष्यकर:- 1. विज्ञानेश्वर 2. विश्वरुप 3. अपरार्क
    मनुस्मृति:- यह प्राचीनतम स्मृति है इसमें भारत की सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है इस स्मृति पर बाद में बहुत से विद्वानों ने भाष्य लिखे।
    भाष्यकार:- 1. मेघातिथि 2. कुल्लूक भट्ट 3. गोविन्द राम 4. भररुचि
    नोटः- अपरार्क या आदित्य प्रथम एक शिलाहार राजा थे जिन्होंने याज्ञवल्क्य स्मृति पर भाष्य लिखा।
    मिताछरा:- इसके लेखक विज्ञानेश्वर है इससे पता चलता है कि पिता की जीवन काल में भी पुत्र को सम्पत्ति का हस्तांन्तरण हो सकता है। यह असम और पूर्वी भारत को छोड़कर सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रचलित है।
    दायभाग:- इसके लेखक जीमूत वाहन इससे पता चलता है कि पिता के मरने के बाद ही पुत्र को सम्पत्ति का हस्तान्तरण हो सकता है। यह असम और पूर्वी राज्यों में प्रचलित है।
    धर्मशास्त्र:- यह धर्मसूत्र स्मृतियों और टीकाओं का सामूहिक नाम है।
    पुराण:- पुराण का अर्थ है प्राचीन आख्यान इसमे प्राचीन राज वंशावलियों का वर्णन मिलता है इसके लेख लोमहर्ष अथवा इनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। वेद व्यास को भी इनका संकलन कर्ता माना जाता है। पुराणों की कुल संख्या 18 है। इसमें मत्स्य या वायु पुराण सर्वाधिक प्राचीन है।

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