ऋग्वैदिक एंव उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति

ऋग्वैदिक संस्कृति

    1. राजनैतिक संगठन– आर्य जब मध्य एशिया के Bactria से सप्त-सैन्धव क्षेत्र में आये तब वे विभिन्न जनों में विभक्त थे जन के प्रमुख को राजन् कहा जाता था। जन विश में विश-ग्राम में ग्राम-कुल या गृह में विभक्त थे। विश के प्रमुख को विशपति, ग्राम के प्रमुख को ग्रामणी एवं कुल के प्रमुख को कुलप कहा जाता है जबकि गृह का प्रमुख गृहपति होता था।
जन——-विश——-ग्राम——कुल या गृह
नोटः- जन शब्द 275 बार तथा विश का उल्लेख 170 बार ऋग्वेद में हुआ है।

Jan
जन का प्रमुख राजन् कहलाता था इसका पद आनुवंशिक था एवं इसका राजभिषेक किया जाता था। राजन् पर नियन्त्रण रखने के लिए दो संस्थायें सभा और समिति थी। सभा योग्य और वृद्ध लोगों के लिए संस्था थी (राज्य सभा की तरह) जबकि समिति में वयस्क लोक भाग लेते थे (लोक सभा) की तरह समिति का नियंत्रण सभा की अपेक्षा अधिक था। समिति के अध्यक्ष को ईशान् कहा जाता था। हलांकि ऋग्वेद में सबसे प्राचीन संस्था का नाम विदथ मिलता है। इसी प्रकार गण भी एक संस्था थी।
नोटः- प्रजा राजा को उपहार देती थी जिसे बलि कहा गया उत्तर वैदिक काल में यह कर हो गया (बाध्य करके वसूला गया भाग कर होता है) अतः पूरे वैदिक काल में कर लिया जाता था ऐसा माना जाता है।
ऋग्वैदिक जनों के राजाओं के बीच आपस में संघर्ष होता रहता था ऐसा प्रथम संघर्ष हरियूपिया नामक स्थान पर मिलता है।
प्रथम संघर्ष:- ऋग्वेद से पता चलता है कि हरियूपिया नामक स्थान पर याब्यावती नदी के तट पर तुर्वश और बीचवृन्त तथा श्रृजंयो के बीच संघर्ष हुआ। हरियूपिया की पहचान हड़प्पा से की जाती है। इस युद्ध में श्रृंजयों की विजय हुई यही संघर्ष आगे बढ़कर दस राज्ञ युद्ध में बदल गया।
दस राज्ञ युद्ध:(स्थान परुष्णवी (रावी) नदी के किनारे, उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मण्डल में -भारत वंश (त्रित्स वंश) के राजा सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे सुदास ने विश्वामित्र की जगह वशिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया फलस्वरूप विश्वामित्र ने दस जनों को इकठ्ठा कर सुदास के विरूद्ध युद्ध कर दिया परन्तु विजय सुदास को ही मिली इस दस-जनों में पंच जन का नाम विशेष रूप से उल्लेख है-पुरु, यदु, अनु द्रुहा तुर्वश तथा अन्य में अलिन, पक्थ भलानस, विषाणी, शिव।
दस राज्ञ युद्ध में दोनों तरफ से आर्य एवं अनार्यों ने भाग लिया था।

  • राजा के पदाधिकारी:- ऋग्वेद से राजा के सहयोगियो का पता चलता है। इन सहयोगियों में पुरोहित, सेनानी और ग्रामणी प्रमुख थे। पुरोहितों का स्थान सर्वोच्च था इन्हें रत्निन कहा जाता था अन्य अधिकारियों में गुप्तचरों को स्पर्श एवं पुलिस को उग्र कहा गया है। सैन्य संगठन- ऋग्वैदिक काल में राजा के पास कोई स्थायी सेना नही थी परन्तु इसकी आवश्यकता पड़ने पर एक अस्थायी सेना जिसे मिलिशिया कहा जाता था का गठन कर लिया जाता था। इसका संचालन व्रात गण, ग्राम और सर्ध नामक कबायली टोलियां करती थी।
  • सामाजिक संगठन:- ऋग्वैदिक आर्य विभिन्न जनों में विभाजित थे जन विश मे विश् ग्राम में और ग्राम गृह या कुल में विभक्त थे। समाज की सबसे छोटी इकाई गृह या परिवार थी इसका मुखिया गृहपति होता था और यह सामान्यतः परिवार का पिता होता था अर्थात यह पितृ प्रधान परिवार था। इस परिवार में पत्नी की भी स्थिति महत्वपूर्ण थी। ऋग्वेद में एक स्थान पर जायेदस्तयम् शब्द मिलता है जिसका अर्थ है पत्नी ही गृह है। शुनः शेप ऋजास्व एवं दिवालिये जुआरी दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि पिता की स्थिति सर्वोच्च थी यह परिवार संयुक्त परिवार था क्योंकि अन्य सभी सम्बन्धियों के लिए (चाचा, चाची, नाना, नानी, भतीजा आदि) एकही शब्द नप्तृ का उल्लेख मिलता है।
  • वर्ण व्यवस्था:- ऋग्वेद से ही वर्ण व्यवस्था की शुरूआत होती है वर्ण के दो अर्थ हैं एक वरण करना अथवा चुनना एवं दूसरा रंग ऋग्वेद के नवें मण्डल में एक व्यक्ति कहता है ’’मैं कवि हूँ मेरा पिता वैद्य हैं और मेरी माता आटा पीसने वाली है विभिन्न कार्यों को करते हुए भी हम लोग एक साथ रहते हैं’’ यह कार्य के आधार पर समाज का विभाजन दर्शाता है। ऋग्वेद से पता चलता है कि आर्य गौर वर्ण के थे जबकि अनार्य श्याम वर्ण के इस तरह रंग के आधार भी विभाजन की शुरूआत हुई।

प्रारम्भ में आर्य तीन वर्णों ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य में विभाजित थे। ऋग्वेद के दशवें मण्डल के पुरुष सूक्त में पहली बार चारों वर्णों का एक साथ उल्लेख मिलता है जिसमें एक आदि पुरुष के मुख से ब्राहमण भुजाओं से क्षत्रिय जाघों से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति दिखाई गयी।
ब्राहमणोडस्य मुखम् आसीत्।
बाहुः राजन्यः कृता।।
उरुतदस्यद्वेश्यः पादभ्याँ।
शुद्रो अजायत्।।’’
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  • दास प्रथा:- ऋग्वेद में दास प्रथा का उल्लेख मिलता है। दास दासियों दोनों का उल्लेख है।
  • स्त्रियों की दशा:- ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त उच्च थी। उनके सभी तरह के अधिकार प्राप्त थे केवल सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त नही था यह अधिकार बाद में गुप्तकाल में पहली बार याज्ञवल्य स्मृति में प्राप्त होता है। सामान्यतः उनके निम्न अधिकार थे।
  1. विवाह की आयु:- ऋग्वैदिक काल में वयस्क होने पर ही (लगभग 16 वर्ष की आयु) विवाह होता था।
  2. उपनयन संस्कार:- पुरुषों की तरह स्त्रियों का भी उपनयन संस्कार होता था यह संस्कार शिक्षा से सम्बन्धित था। इसी संस्कार के बाद वेद पढ़ने का अधिकार प्राप्त होता था ऋग्वेद काल में बहुत सी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है जैसे-अपाला, घोसा, लोपा, मुद्रा, शिक्ता आदि।
  3. राजनीतिक अधिकार:-    स्त्रियां सभा समिति एवं विदभ में भाग ले सकती थी।
  4. विधवा विवाह:- ऋग्वेद में विधवा विवाह का भी उल्लेख है।
  5. बहुपति प्रथा:- ऋग्वेद से पता चलता है कि समाज में बहुपति प्रथा भी विद्मान थी।
  6. नियोग प्रथा:- ऋग्वेद में नियोग प्रथा का उल्लेख है इस प्रथा के अन्तर्गत पति के विदेश होने पर या 10 वर्षों से अधिक अनुपस्थित होने पर नपंुसक होने पर स्त्रियां किसी नजदीकी रिश्तेदार से पुत्र की कामना कर सकती थी। इसमें देवर को विशष रूप से मान्यता प्राप्त थी। इससे उत्पन्न पुत्र को पति की ही संन्तान माना जाता था। इससे उत्पन्न सन्तान को क्षेत्रज के नाम से जाना जाता है वहीं कुमारी कन्या (अमाजू) से उत्पन्न सन्तान कनीन तथा विधवा (पुनर्भू) से उत्पन्न सन्तान को पुनर्भव के नाम से जाना जाता था।

   स्त्रियों में निम्न कुप्रथायें नही थी।
1. सती प्रथा    2. पर्दा प्रथा    3. दहेज प्रथा
ऐसी स्त्रियाँ जो जीवन भर विवाह नही करती थी केवल शिक्षा प्राप्त करती थी उन्हें अमाजू कहा जाता था।
इस समय विवाह के दो प्रकार प्रचलित थे अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह में पुरुष उच्च वर्ण का होता था जबकि महिला निम्न वर्ण की इसे मान्यता भी प्राप्त थी। इसके विपरीत प्रतिलोम विवाह में पुरुष निम्न वर्ण एवं महिला उच्च वर्ण की थी इसे सामाजिक मान्यता नही प्राप्त थी।
वस्त्र आभूषण:- सामान्यतः तीन प्रकार के वस्त्र प्रचलित थे

  1. नीवी:- अन्दर पहनने वाला वस्त्र।
  2. वासः- सामान्य वस्त्र।
  3. विश्वास:- ऊपर से पहना जाने वाला वस्त्र।

सूती कपड़ा ऊनी कपड़ा आदि का उल्लेख मिलता है कपड़ो में कढ़ाई भी होती थी। पगड़ी को ऊष्णीय कहा गया।
आभूषण:- ऋग्वेद में न तो लोहें का उल्लेख है और न ही चांदी का केवल एक ही धातु अयस का उल्लेख मिलता है। अयस का अर्थ ताँबा या काँसा से लगाया गया है। ऋग्वेद में  स्वर्ण आभूषणों का उल्लेख है जिसमें कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं।

  1. रुक्म:- यह स्वर्ण का गले का हार था।
  2. निष्क:- यह स्वर्ण ढे़र था जिसका उपयोग विभिन्न कार्यों में होता था जैसे-गले का हार एवं तौल या माप की इकाई के रूप में।
  3. मन् (Mana):- यह भी स्वर्ण ढेर था।

खान-पान:- ऋग्वेद में चावल और मछली का उल्लेख का उल्लेख नही है आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे ज्यादातर भोजन दूध और उससे मिश्रित वस्तुओं का होता था। एक प्रकार की खिचड़ी तैयार की जाती थी। दूध में यव् को मिलाकर क्षीर पकौदन तैयार किया जाता था। जबकि सत्तू को दही में मिलाकर करंभ नामक भोजन बनाया जाता था।
पेय पदार्थों में सोम और सुरा का उल्लेख आता है।
1. सोम:- यह आर्यो का मुख्य पेय था ऋग्वेद का पूरा नवां मण्डल सोम देवता को ही समर्पित है।
2. सुरा:– यह एक मादक पेय था जिसकी निन्दा की गई है।
अमोद-प्रमोद:- मनोरंजन के साधनों में नृत्यगान, रथ दौड़, पासा धूत क्रीड़ा आदि प्रमुख थे।
आर्थिक दशा:- ऋग्वैदिक युग में कृषि की अपेक्षा पशु पालन का ज्यादा महत्व था क्योंकि आर्य कबायली थे और भम्रण शील थे उनका जीवन स्थाई नहीं था ऐसी दशा में पशु पालन का महत्व बढ़ जाता है। ऋग्वेद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पशु गाय थी।
गाय:- ऋग्वेद में 176 बार गाय का उल्लेख मिलता है इससे इसकी महत्ता का पता चलता है अधिकांश लड़ाईयां गायों के लिए ही होती थी गायों के लिए निम्न शब्द प्रयोग किये जाते थे। इसे वैदिक काल में सम्पत्ति के रूप में प्रयोग किया जाता था जो कई के रूप में जानी जाती थी।

  1. गविष्टि:- वैसे गविष्टि का साहित्यिक अर्थ गायों का अन्वेषण है परन्तु यह शब्द युद्ध का प्रयाय बन गया था क्योंकि अधिकांश पशुओं की चोरियां गायों के लिए ही होती थी। ’पणि’ नामक व्यापारी पशुओं की चोरी के लिए विख्यात थी। एक अन्य प्रकार के दान शील व्यापारी वृबु का भी उल्लेख है।
  2. अघन्या:- इसका साहित्यिक अर्थ न मारने योग्य है।
  3. अष्ट कर्णी:– इसका अर्थ जिसके कान पर 8 का निशान हो अथवा छेदे हुए कान वाली।
  4. गोषु, गभ्य आदि-युद्ध के प्रयाय शब्द हैं।

2. अश्व:- गाय के बाद दूसरा महत्वपूर्ण पशु, घोड़ा था इसका उपयोग मूलतः रथों में होता था।
ऋग्वेद में बैल, भैंसा, भेंड़, बकरी, ऊँट आदि सभी पशुओं का उल्लेख है परन्तु सिन्धु काल में प्रचलित बाघ और हाथी का उल्लेख नही है।
कृषि:- ऋग्वेद में कृषि का स्थान भी महत्वपूर्ण था परन्तु ऋग्वेद के केवल 24 मंत्रों में ही कृषि का उल्लेख है। कृषि से सम्बन्धित निम्नलिखित शब्द महत्वपूर्ण है-
1. चर्षणी-कृषि या कृष्टि    2. क्षेत्र-जुता हुआ खेत
3. उर्वरा-उपजाऊ भूमि    4. लाडग्ल-हल
5. वृक-बैल                      6. कीवास्-हलवाहे
7. सीता-हल से बनी हुई नालियां या कूड़
8. खिल्यः- दो खेतों के बीच छोड़ी गई पट्टी-इस शब्द का प्रयोग परती ऊसर आदि भूमियों के लिए भी किया गया है यह ऐसा क्षेत्र था जहाँ घास उग आता था।
9. करीस-गोबर का खाद  10. अवट्-कुएँ के लिए
11. तितऊः चलनी           12. उर्दर:- मांपने का बर्तन
ऋग्वेद में एक ही फसल मव का उल्लेख है जो जौ गेंहू के लिए प्रयुक्त हुआ है।
3. उद्योग धन्धे:- आर्यो का मुख्य व्यवसाय वैसे तो पशुपालन था परन्तु ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, कर्मार आदि शिल्पियों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में केवल एक ही धातु अयस् का उल्लेख ताँबा अथवा काँसा के लिए किया गया है ऋग्वेद में बढ़ई के लिए तक्षन तथा धातुओं के लिए तथा धातुओं पर कार्य करने वाले को कर्मार कहा गया है सोना के लिए हिरण्य शब्द तथा सिन्धु नदी के लिए हिरण्यी शब्द मिलता है क्योंकि सिन्धु नदी से सोना बहुतायत में निकाला जाता था। बौने जो धातुओं पर कार्य करते थे उन्हें ऋबु कहा गया है कड़ाई बुनाई के लिए सिरी पेशस्करी शब्द प्रयुक्त हुआ है नाई के लिए वप्ता एवं चमड़े पर कार्य करने वालों को चर्मकार कहा गया।
व्यापार:- ऋग्वेद में यद्यपि समुद्र शब्द प्राप्त होता है परन्तु आर्यों को वास्तविक समुद्र की जानकारी नही थी। यहाँ समुद्र से तात्पर्य जल राशि से है इस समय सिक्के भी प्रचलित नही थे। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि आन्तरिक एवं वाह्य व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था। ऋग्वेद में कुछ शब्द स्वर्ण के ढेर के रूप में प्रयुक्त हुए हैं जिनका उपयोग तौल की इकाई के रुप में किया जाता था।
निष्क:- ऋग्वेद में स्वर्ण ढेर था जिसका प्रयोग वस्तु विनिमय में भी हो रहा था आगे चलकर निष्क ही भारत का प्रथम स्वर्ण सिक्का कहलाया। मौर्य काल में भी स्वर्ण सिक्कों का उल्लेख है परन्तु प्रारम्भिक सिक्के आहत सिक्के होते थे पहली बार स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय हिन्द यवन ;प्दकव.ळतमंजेद्ध शासकों को दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ने ही भारत में पहली बार लिखित सिक्के चलाये सबसे अधिक स्वर्ण मुद्रायें गुप्त काल में जारी की गई परन्तु सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण के सिक्के चलाने का श्रेय कुषाण शासको को जाता है।
धार्मिक दशा:- ऋग्वैदिक आर्य कबायली थे अतः वे एक स्थान पर स्थिर नही थे उनका ज्यादातर सामना प्रकृति की विभिन्न शक्तियों से होता था इसी कारण आर्यों के प्रारम्भिक देवता प्रकृति के देवता है यास्क ने अपने ग्रन्थ निरुक्त में ऋग्वैदिक देवताओं की देव मण्डली बनाई है जो निम्नलिखित है इनकी कुल संख्या 33 है।

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  1. आकाश के देवता:- घौष, सूर्य, ऊषा, मित्र, सविता, विष्णु, अश्विन पूजन, वरुण, अदिति।
  2. आन्तरिक्ष के देवता:- इन्द्र, वायु, मारुत, रुद्र, पर्जन्य, आप आदि।
  3. पृथ्वी के देवता:- अग्नि, सोम, अरण्यानी, बृहस्पति, सिन्धु, सरस्वती।

इन्द्र:- यह ऋग्वेद के सबसे प्रमुख देवता है इसकी स्तुति में सर्वाधिक 250 सूक्त है यह मुख्यतः वर्षा एवं झंझावत का देवता है अनार्यों के किले तोड़ने के कारण इसका एक नाम पुरन्दर भी पड़ गया। वृत्तासुर नामक राक्षस को मारने के कारण इसका एक नाम वृत्तहन्ता था। बादलों को भेदने के कारण पुरभिद एवं सोम का अधिक पान करने के कारण सोमापा नाम पड़ गया। इन्द्र का प्राचीन समय में कृष्ण के साथ संघर्ष का उल्लेख है।
अग्नि:- ऋग्वैदिक देव मण्डली में अग्नि का स्थान दूसरा था इस पर कुल 200 सूक्त रचे गये हैं इसका मुख्य कार्य आर्यों एवं देवताओं के बीच मध्यस्थ का था।

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वरूण:- ऋग्वैदिक देवताओं में वरुण का स्थान तीसरा था मूलतः यह जल का देवता था इसके साथ ही यह प्रकृति के नैतिक एवं भौतिक नियमों का संरक्षक भी था। इस रुप में इसका एक अन्य कार्य पापियों को दण्ड देना भी था। ऋग्वेद में इसका एक नाम ऋतस्यगोपा भी मिलता है। वरूण की तुलना ईरानी देवता आहुरमज्जा से की जाती है।
सोम:- यह वनस्पतियों का देवता था ऋग्वेद का पूरा नवां मण्डल इसी देवता को समर्पित है।
अश्विन:- ये आर्यों के चिकित्सक देवता थे इस रुप में इन्होंने आर्यो के टूटे पैरों को जोड़ने का कार्य किया उनके नावों आदि की मरम्मत भी की ये जुड़वा भी माने जाते हैं एवं तारे थे।
अरण्यानी:- यह जंगल की देवी थी।
मरुत:- यह आँधी का देवता था।
धौ धौष:- यह आर्यों का सबसे प्राचीन, देवता एवं पिता तुल्य था।
मित्र:- उदित होता हुआ सूर्य।
सविता:- जब सूर्य चमकने लगता है तब इसे सूर्य सविता कहा जाता है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र इसी सविता को समर्पित है।
पूजन:- पशुओं और वनस्पतियों का देवता।
विष्णु:- ऋग्वेद में इनके द्वारा आकाश को स्थिर करने का उल्लेख है।
रूद्र:- ऋग्वेद में इनके क्रोध रूप का वर्णन है।
धर्जन्य:- बादल-मूलतः यह वर्षा एवं नदी के देवता है।
ऊषा:- यह देवी थी। सूर्य निकलने के पूर्व की बेला को ऊषा काल कहा गया है।
अदिति:- यह आर्यों की सर्वशक्ति मान या सार्वभौम प्रकृति की देवी थी।
आप:- श्रृष्टि करने वाला देवता ।
वृहस्पति:- आर्यों के गुरु एवं यज्ञ के देवता।
सरस्वती:- ज्ञान की देवी।
ऋतु की संकल्पना:- ऋग्वेद में ऋतु की संकल्पना विस्तृत रूप में की गई है यह प्रकृति में व्याप्त भौतिक एवं नैतिक नियम है इनके देवता को वरुण (ऋतस्यगोपा) कहा गया है।
ऋग्वैदिक काल के प्रारम्भ बहुदेववाद का प्रचलन मिलता है फिर एक समय में एक ही देवता को प्रमुखता दी गई। मैक्समूलर ने इस प्रकृति को भ्मदवजीपेउ (हीनोथिज्म) कहा है ऋग्वेद के दसवें मण्डल में एकेश्वर बाद की झलक दिखाई पड़ती है जहाँ ’’ एक संत् विप्राः बहुधा वदन्ति’’ अर्थात सत्य एक है ज्ञानी उसे भिन्न प्रकार से बताते हैं एवं ’’महद देवानां सुरत्वमेकम्’’ अर्थात देवताओं की शक्ति एक ही है।
उपासना की रीति एवं उद्देश्य:- देवताओं की उपासना की रीति मुख्यतः स्तुति पाठ करना, और यज्ञ बलि अर्पित करना या याज्ञाहुति में शाक जौ आदि वस्तुएं चढ़ाई जाती थी परन्तु इन्हें चढ़ाते समय कोई अनुष्ठाानिक या कर्मकाण्ड नहीं होते थे। पशुओं की बलि चढ़ाने के लिए एक स्तम्भ से बांधा जाता था जिसे यूप कहा जाता था।
आर्यों की उपासना का मुख्य उद्देश्य लौकिक था इस रुप में वे संतति पशु धन धान्य आदि की कामना करते थे वे लोग आध्यात्मिक उत्थान या जन्म मृत्यु के कष्टों से मुक्ति के लिए पूजा पाठ नही करते थे।

उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति:-

राजनैतिक दशा:- उत्तर वैदिक काल में छोटे-छोटे जन् आपस में मिलाकर एक बड़ी इकाई जनपद में परिवर्तित हो गये। ऐतरेय ब्राह्मण में पहली बार राष्ट्र शब्द का उल्लेख भी मिलता है। उदाहरणार्थ पुरु भारत – कुरु एवं तुर्वश और क्रीवि मिलकर पांचाल हो गये। इस प्रकार राजा की महत्ता में वृद्धि हुई। राजा ने इसका फायदा उठाया और अपने पर से सभा और समिति के नियन्त्रण को समाप्त कर दिया।
उत्तर-वैदिक काल में सर्वप्रथम समाप्त होनी वाली संस्था विद्थ थी। इस काल में राजा अलग-अलग उपाधियां धारण करने लगे। उदाहरणार्थ-मध्यदेश के राजा को राजन, पूर्व देश के राजा को सम्राट पश्चिम के राजा को स्वराट और उत्तर के राजा को विराट एवं दक्षिण के राजा को भोज कहा गया जो राजा इन चारों दिशाओं के राजाओं को जीत लेता था उन्हें एकराट कहा जाता था।

अथर्ववेद से पता चलता है कि सभा और समिति का महत्व अभी भी था क्योंकि उसे अथर्ववेद में प्रजापति की ’दो पुत्रियां’ कहा गया है। इस काल में कई राजाओं के नाम प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में मृत्युलोक के देवता परीक्षित का उल्लेख है उपनिषदों में कई राजाओं के नाम मिलते हैं उदाहरणार्थ-
काशी        –    अजातशत्रु।
विदेह        –    जनक।
केकय       –    अश्वपति।
पांचाल      –    प्रवाहण जैवलि।
कुरु          –    उद्धालक आरुणि।
शतपथ ब्राह्मण से पता चलता है कि याज्ञवक्य ने राजा जनक से शिक्षा प्राप्त की केकय जनपद का राजा अश्वपति एक दार्शनिक राजा था। कुरु जनपद के राजा उद्दालक अरुणि एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता के विषय में विख्यात संवाद् का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद में है। वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य एवं गार्गी का प्रसिद्ध संवाद है।
राजा का राज्याभिषेक राजसूय यज्ञ के द्वारा सम्पन्न होता था इसका विस्तृत वर्णन हमें शतपथ ब्राहमण में मिलता है इस ग्रन्थ से पता चलता है कि राजा राज सूर्य यज्ञ के समय रत्निन् के यहाँ जाता था।
रत्निन्:- ये राज्य के योग्य कर्मचारी थे शतपथ ब्राहमण में 12 रत्नियों का उल्लेख है जिनका समर्थन राजा प्राप्त करने की कोशिश करता था।

  1. सेनानी:-उत्तर वैदिक काल में यह सबसे महत्वपूर्ण रत्निन् था ऐतरेय ब्राहमण से पता चलता है।
  2. पुरोहित:- इसका स्थान दूसरा था।
  3. ग्रामणी
  4. युवराज
  5. महिषि:– राजा की प्रमुख रानी या पट्ट रानी।
  6. सूत   – राजा का सारथी।
  7. क्षत्ता:- द्वार पाल।
  8. भागदुध:- कर लेने वाला अधिकारी कर का भाग 1/6 होता है।
  9. संग्रहीता:- कोषाध्यक्ष
  10. अक्षवाप:- अक्ष क्रीडा में राजा का साथी।
  11. पालागल:- विदूषक का पूर्वज
  12. गोविकर्तन:- आखेट में राजा का साथी या जंगल का प्रमुख भी होता था

राजसूय यज्ञ के अतिरिक्त राजा अश्वमेघ यज्ञ एवं वाजपेय यज्ञ करता था। अश्वमेघ यज्ञ राज्य के विस्तार से सम्बन्धित था जबकि वाजपेय यज्ञ एक प्रकार की रथ दौड़ थी जिसमें राजा का रथ सबसे आगे रहता था।

अश्वमेघ
अथर्ववेद में सूत और ग्रामणी को कत्र्त अर्थात राजा बनाने वाला कहा गया है।
कर प्रणाली:- उत्तर-वैदिक युग में बलि एक प्रकार का कर हो गया। भू-राजस्व के लिए भाग शब्द मिलता है। इसको वसूलने वाले अधिकारी को भागदुध एवं इकठ्ठा करने वाले अधिकारी को संग्रहिता कहा गया। यह कर वैश्य वर्ग ही देता था जिसकी उत्पत्ति विश् शब्द से मानी जाती है इस कारण राजा का एक नाम विशमत्ता पड़ गया जबकि वैश्य को अन्यस्य बलिकृतः या अनास्यद्य कहा गया है।
सेना:- उत्तर वैदिक काल में भी स्थायी सेना की कल्पना नहीं थी आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न कबाचली टोलियां एक स्थायी सेना का गठन कर लेती थी।
सामाजिक दशा:– उत्तर वैदिक काल में आर्यों की सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी यद्यपि वर्ण व्यवस्था की नींव ऋग्वैदिक काल में ही पड़ गयी थी परन्तु वह स्थापित उत्तर-वैदिक काल में ही हुई। समाज में चार वर्ण ब्राहमण, राजन्य, वैश्य और शूद्र थे। इनमें ब्राहमणों की प्रतिष्ठा सर्वाधिक थी। ऋग्वैदिक काल में कुल सात पुरोहित थे। उत्तर वैदिक काल में उनकी संख्या बढ़कर 17 हो गई इनमें ऐसे पुरोहित जिन्हें ब्रम्ह का ज्ञान होता था वे ब्राहमण कहलाये इनका मुख्य कार्य यज्ञ और अनुष्ठान था-
दूसरा वर्ण राजन्य था ऐतरेय ब्राहमण से पता चलता है कि इसकी स्थिति ब्राहमणों से श्रेष्ठ थी वैश्व वर्ण की उत्पत्ति विश् शब्द से हुई समाज का यही वर्ग कर देता था इसीलिए इसका नाम अनस्यबलकृत भी पड़ गया।
शूद्रों की दशा समाज में निम्न थी उसका कार्य अन्य वर्गों की सेवा करना था उत्तर-वैदिक काल में इस वर्ण का उपनयन संस्कार बन्द कर दिया गया जिससे उसकी सामाजिक दशा का हास हुआ। उसके कुछ अन्य नाम पड़ गये जैसे- अनस्यप्रेष्य: (अन्य वर्णों का सेवक) कामोत्थाप्स (मनमाने ढंग से उखाड़ फेंके जाने वाले) यथा काम बध्य (इच्छानुसार वध किया जाने वाला) इससे पता चलता है कि समाज में इनकी दशा गिर रही थी।
इस समय समाज में एक अन्य वर्ग रथकार का स्थान महत्वपूर्ण था इसका भी उपनयन संस्कार ऊपर के तीन वर्णों की भाँति होता था।
आश्रम व्यवस्था:- उत्तर वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था की शुरुआत हुई कुल चार आश्रम माने जाते हैं जिसमें से प्रथम तीन आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ उत्तर वैदिक काल में ज्ञात थे। चैथा आश्रम सन्यास इस समय अज्ञात था प्रथम तीन आश्रमों का उल्लेख सर्वप्रथम एक साथ छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है।
Stage
ब्रम्हचर्य:- इस आश्रम का मूल उद्देश्य मनुष्य का बौद्धिक विकास तथा शिक्षा प्राप्त करना था। इसी समय उपनयन संस्कार किया जाता था ब्राहमण का उपनयन संस्कार 8 वर्ष की अवस्था में क्षत्रिय का 11 एक वैश्व का 12 वर्ष की अवस्था में उपनयन संस्कार होता था।
शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षकों को आचार्य कहा जाता था जो शिक्षक पैसा लेकर शिक्षा प्रदान करते थे उन्हें उपाध्याय कहा जाता था। जो कन्या आश्रम में जीवन भर शिक्षा प्राप्त करती थी उन्हें अमाजू और जो निश्चित समय तक प्राप्त करती थी उन्हें सद्योवधू कहा जाता था। इसी तरह जो छात्र जीवन भर शिक्षा प्राप्त करते थे उन्हें नैष्ठिक और जो निश्चित समय तक शिक्षा प्राप्त करते थे उपकुर्वाण कहा जाता था।
गृहस्थ आश्रम:- यह आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ था तथा समाज के सभी वर्गों के लिए मान्य था। इस आश्रम में एक व्यक्ति को तीन ऋणों से मुक्ति प्राप्त करनी पड़ती थी साथ ही उसे पंचमहा यज्ञ सम्पादित करना पड़ता था।
त्रिश्रृण:- इनमें शामिल थे।

  1. देव ऋण:- देवताओं को यज्ञ आदि करके प्रसन्न किया जाता था।
  2. रह्म ऋण या ऋषि ऋण:- वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन आदि करके।
  3. पितृ ऋण:- पुत्र की उत्पत्ति करके।

नोटः- इन तीन ऋणों में मातृ ऋण सम्मिलित नही था।
पंचमहायज्ञ:- इसमें सम्मिलित थ।

  1. देव यज्ञ।
  2. ब्रम्ह यज्ञ या ऋषि यज्ञ ।
  3. पितृ यज्ञ।
  4. भूत यज्ञ (सभी प्राणियों के कल्याण के लिए)।
  5. नृत्य यज्ञ अथवा अतिथि यज्ञ या मनुष्य यज्ञ।

वानप्रस्थ आश्रम:- इस आश्रमों को सम्पादित करने वाले व्यक्ति का सम्पर्क समाज से बना रहता था। हलाँकि अब वह घर से निकलकर जंगल आदि में रहता था।
सन्यास:- इसमें व्यक्ति का समाज से सम्बन्ध समाप्त हो जाता था।
नोट:- इन आश्रमों का सम्बन्ध पुरुषार्थ समाप्त हो जाता था। जीवन के उद्देश्य को निर्धारित करते हैं इनकी संख्या चार है- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। इनमें प्रथम तीन को त्री वर्ग में सम्मिलित किया जाता है।
गोत्र प्रथा:- उत्तर वैदिक काल में ही गोत्र प्रथा की शुरुआत हुई प्रारम्भ में गोत्र का अर्थ ऐसे स्थान से था जहाँ एक ही कुल की गायें पाली जाती थी। परन्तु बाद में एक ही वंश से उत्पन्न पुरुषों के लिए यह शब्द प्रयुक्त होने लगा।
स्त्रियों की दशा:– ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आयी। जिसके उदाहरण निम्नलिखित हैं।

  1. स्त्रियों का सभा और विद्थ में भाग लेना बन्द हो गया।
  2. स्त्रियों का उपनयन संस्कार बन्द हो गया इससे उनकी शिक्षा में गिरावट् आयी। हलांकि इस समय कई विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है जैसे-याज्ञवल्क्य को दो पत्नियाँ मैत्रेयी और कत्यायनी थी। इसी तरह गार्गी अत्यन्त विदुषी महिला थी। अन्य स्त्रियों में सुभला वेदवती आदि के नाम भी मिलते हैं।
  3. विवाह की आयु गिरकर 14 वर्ष हो गई अर्थात अब उनका अल्प आयु में विवाह होने लगा।

नोट:- सम्पत्ति का अधिकार अब भी नही था पर्दा प्रथा एवं सती प्रथा प्रचलित न थीं। समाज में स्त्रियों की गिरती स्थिति का पता समकालीन वैदिक साहित्यों से चलता है जैसे- ऐतरेय ब्राहमण के अनुसार ’पुत्री ही समस्त दुःखों का स्रोत है’ मैत्रायणी संहिता-स्त्रियों को पासा एवं सुरा के समान समाज की बुराई के रूप में दर्शाया गया है।
वृहदारण्यक उपनिषद:- याज्ञवल्क्य एवं गार्गी के बीच का प्रसिद्ध संवाद है।
नोटः– इसका अर्थ यह नही है कि स्त्रियों की दशा बहुत गिर गयी थी। शतपथ ब्राहमण में उन्हें अर्धांगिनी कहा गया है।

आर्थिक दशा

कृषि:- उत्तर वैदिक काल में कृषि सबसे प्रमुख व्यवसाय था शत्पथ ब्राहमण में 6, 8, 12, एवं 24 बैलों तक जोते जाने वाले हलों का उल्लेख है। इसी पुस्तक में कृषि की पूरी प्रक्रिया का वर्णन मिलता है हल के लिए सीर एवं जुलाई के लिए कृषन्तः बुवाई के लिए वपन्तः मड़ाई के लिए मृणन्त एवं कटाई के लिए लुन्नतः शब्द मिलता है। एक हजार ईसा पूर्व में लौह के अविष्कार के कारण (एटा जिले के अंतरजी खेड़ा में) कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ा। लोहे के लिए श्याम् अयस अथवा कृष्ण अयस का उल्लेख मिलता है। इस समय उत्पन्न होने वाली कई फसलों के नाम मिलते हैं जैसे-चावल के लिए ब्रीहि अथवा तंडुल, गेहँू के लिए गोधूम, गन्ने के लिए ईक्षु, सरसों के लिए सारीशाक उड़द के लिए माष सावाँ के लिए श्यामाक सन के लिए शण अलसी के लिए उम्पा आदि शब्द मिलते हैं।
सिंचाई के साधनों में भी बढ़ोत्तरी हुई। ऋग्वेद में जहाँ केवल एक ही साधन अवट् (कुआँ) का उल्लेख है वहीं अथर्ववेद में पहली बार नहरों का उल्लेख मिलता है।
पशुपालन:- उत्तर वैदिक काल से हाथी, बाघ शेर आदि सभी पशुओं का उल्लेख मिलता है।
उद्योग-धन्धे:- उत्तर वैदिक कालीन ग्रन्थों में कई तरह के उद्योगों के प्रचलन का उल्लेख है इस समय के प्रमुख उद्योगों में।

  1. कुलाल या कुम्भकार:- यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी के बर्तन बनाते थे। जैसे-P.G.W., N.B. W.
  2. टोकरी बनाने वाले:- इन्हें विदलकारी कहा जाता था।
  3. रंगरेज:- रंगों पर कार्य करने वाले।
  4. रजयित्री:- कपड़े रगने वाली।
  5. वर्णकार:- सोने पर कार्य करने वाले।
  6. चर्मकार

व्यापार:- उत्तर वैदिक काल में यद्यपि आर्यों को समुद्र की जानकारी थी परन्तु सिक्कों का प्रचलन अब भी नहीं हुआ था। आर्यों को पश्चिम और पूर्वी समुद्र (अरब सागर और हिन्द महासागर) की जानकारी थी। इस समय तक बन्दरगाह का उल्लेख नही मिलता है न ही किसी बाहरी देश के साथ व्यापार का ही उल्लेख मिलता है। निण्क, मन, रुक्म आदि शब्द ऋग्वैदिक की तरह ही और उसी अर्थ में प्रयुक्त किये जाते रहें।
उत्तर वैदिक काल में यद्यपि नगर शब्द का उल्लेख मिलता है परन्तु ये नगर प्रारम्भिक अवस्था के ही थे ज्यादा से ज्यादा इन्हें हम आद्य नगर ;च्तवजव ।तइंदद्ध की संज्ञा दे सकते हैं। इस समय के कुछ नगरों में हस्तिनापुर, कौशाम्बी, काशी आदि का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक दशा:- उत्तर वैदिक काल में धार्मिक दशा में तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टि गोचर होते हैं-

  1. देवी-देवताओं में परिवर्तन।
  2. उपासना की रीति में परिवर्तन।
  3. उपासना के उद्देश्य में परिवर्तन।

चैथा परिवर्तन उपनिषदीय प्रक्रिया के रूप में दिखाई पड़ता है।
1. देवी-देवताओं में परिवर्तन:- उत्तर वैदिक युग में ऋग्वैदिक देवताओं की महत्ता घट गई अब प्रजापति, विष्णु और शिव सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता हो गये पहले के एक देवता विश्वकर्मा का प्रजापति में विलय हो गया।
2. उपासना की रीति में परिवर्तन:- उत्तर वैदिक युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण धार्मिक परिवर्तन उपासना की रीति में ही दृष्टिगोचर होता है अब वैदिक मन्त्र स्तुति की जगह कर्मकाण्ड अधिक महत्वपूर्ण हो गये। प्रत्येक वेद के साथ अलग-अलग पुरोहित जुड़ गये उदाहरणार्थ-
वेद               पुरोहित
ऋग्वेद      –    होता (मन्त्रोच्चार करना)
सामवेद    –    उद्गाता (मन्त्र गायन)
यजुर्वेद     –    अध्वर्यु (कर्म-काण्ड)
अथर्ववेद  –    ब्रम्हा
इन सभी पुरोहितों पर नजर रखने का कार्य ब्रम्हा अथवा ऋत्विज करता था।
यज्ञ:- उत्तर-वैदिक काल में मुख्यतः तीन प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे।

  1. गृह कर्माणि यज्ञ:- ये यज्ञ संस्कार विवाह आदि विभिन्न समयों में सम्पादित किये जाते थे।
  2. ऐसे यज्ञ जो उत्सवों त्यौहारों आदि अवसर पर सम्पादित किये जाते थे। इन यज्ञों में दशयज्ञ, सौत्रामणि यज्ञ, अग्निहोतृ यज्ञ आदि प्रमुख हैं।
  3. ऐसे यज्ञ जो सामूहिक किये जाते थे और कई दिनों तक चलते थे इन यज्ञों में अग्निष्टोम, राज सूय, अश्वमेघ, बाजपेय, पुरुषमेघ आदि या प्रमुख है।

दश यज्ञ:- यह यज्ञ आमावस्या के समय किया जाता था इस यज्ञ के प्रधान देवता अग्नि और इन्द्र थे।
सौत्रमणि यज्ञ:- इस यज्ञ में सुरा की आहुति दी जाती थी मूलतः यह इन्द्र के लिए किया हुआ यज्ञ था।
अग्निष्टोम:- इस यज्ञ में सोम का सर्वाधिक उपयोग होता था।
पुरुषमेद्य यज्ञ:- यह यज्ञ पाँच दिनों तक चलता था इसमें पुरुष की भी बलि दी जाती थी सर्वाधिक 25 यूपों का निर्माण इसी यज्ञ में किया जाता था।
उद्देश्य:- शतपथ ब्राहमण में पहली बार पुर्नजन्म के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है अब धार्मिक क्रिया-कलाप का उद्देश्य लौकिक के साथ-साथ पारलौकिक भी हो गया। उत्तर-वैदिक काल में ही मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है।
उत्तर वैदिक के अन्तिम चरणों में याज्ञिक कर्म काण्डों के विरूद्ध उपनिषदों में प्रतिक्रिया दिखाई पड़ती है उपनिषदों में ही आत्मा और ब्रम्ह के अद्वैतवाद के सिद्धान्त का निरुपण किया गया। मुण्डकोपनिषद में यज्ञों की टूटी हुई नवकाओं के समान बताया गया है जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता।

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