इतिहास एक सामान्य परिचय

इतिहास इति++आस् शब्दों के मेल से बना हुआ है। जिसका अर्थ है ऐसा निश्चित रूप से हुआ। अर्थात बीती हुई घटनाओं को हम इतिहास कहते हैं। किन्तु अतीत की सभी घटनाओं को इतिहास नही कह सकते हैं। ’’प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित अतीत के क्रमबद्ध ज्ञान को इतिहास कहते हैं’’ व्यूरी ने इतिहास को विज्ञान कहा है। इनके अनुसार-

इतिहास विज्ञान है न कम न ज्यादा
परन्तु इसे मानविकी विषय के महत्वपूर्ण विषयों में जाना जाता है। लिपि के आधार पर इतिहास को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है।

  1. प्रागैतिहास          
  2. आद्यइतिहास           
  3. इतिहास  

प्रागैतिहासिक पंचांगः-पृथ्वी की समय सारणी को प्रागैतिहासिक पंचांग कहा जाता है। इस समय सारणी को अनेक महाकल्पों में विभाजित किया गया है, महाकल्य कल्यों में बटें हैं एवं कल्प का विभाजन युगों में किया जाता है।
प्रागैतिहास काल:- प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज एवं संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। भारतीय पुरातत्व विभाग का जनक कनिघंम को माना जाता हैराबर्ट ब्रुशफूट को भारतीय प्रागैतिहास का पिता कहा जाता है। क्योंकि इन्होंने ही 1863 ई0 में मद्रास के पल्लवरम से पुरापाषाण उपकरण की खेाज की।
प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में बांटा गया है। 

  1. पुरापाषाण काल
  2. मध्य पाषाण काल
  3. नव पाषाणकाल    

पुरापाषाण काल-पुरापाषाण काल को भी तीन भागों में बांटा गया है।

  1. पूर्व-पुरा पाषाण काल
  2. मध्य-पुरा पाषाण काल  
  3. उच्च पुरापाषाण काल
पूर्व पुरा पाषाण काल (Lower Palaeolithic) (25 लाख ई0पू0 से 9 लाख ई0पू0)- इस काल से मानव आखेटक एवं खाद्य संग्राहक था। उसे अग्नि की जानकारी थी, किन्तु उसका प्रयोग करना नहीं जानता था। इस काल के उपकरण भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त हुए हैं। इन्हें दो प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है।
चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति-इसे सोहन-संस्कृति भी कहा जाता है क्योंकि पंजाब के सोहन घाटी से सर्वप्रथम इसके उपकरण प्राप्त हुए हैं।
हैण्ड एैक्स संस्कृति- इसके उपकरण सर्वप्रथम बदमदुरै तथा अन्तिरपक्कम (मद्रास) से पाये गये हैं।
कुछ मुख्य स्थल निम्नलिखित है-
    आरम्भिक सोहन प्रकार के पेबुल उपकरण चित्तौड़ (राजस्थान) सिंगरौली तथा बेलन नदी घाटी (क्रमशः उ0प्र0 मिर्जापुर, इलाहाबाद) साबरमती तथा माही नदी घाटियाँ (गुजरात) वेल्लौर एवं गिंड्नूर (आन्ध्रा) मयूर भंज (उड़ीसा) से प्राप्त दिये गये हैं। महाराष्ट्र में गोदावरी नदी की सहायक प्रवरा नदी के पास नेवासा में कर्नाटक के मालप्रभा और घाट प्रभाव की घाटियों में भी इस तरह के उपकरण मिले हैं। बेलन घाटी के लोहरा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की प्रतिमा मिली है।
मध्य-पुरा पाषाण काल (Middle, Palaeolithic Age): इस समय के औजारों में जैस्पर चर्ट के पत्थरों का प्रयोग किया गया है। फ्लैक के बने औजार प्रयुक्त होने लगे, इन औजारों में बेघनी और खुरचनी प्रमुख है। मध्य-पुरा पाषाण काल को ’फलक संस्कृति’ की संज्ञा दी जाती है।
    इस काल के उपकरण महाराष्ट्र, गुजरात, आन्ध्रा, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर मिर्जापुर, आदि विविध पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं। अब मध्य-पुरा पाषाण कालीन स्थल अफगानिस्तान, ईरान, ईराक और पाकिस्तान में भी मिले हैं। इनमें अधिकांश उपकरण ’मोस्तरी संस्कृति’ से खूब मिलते-जुलते हैं।
उत्तर-पुरापाषाण काल
(Upper, Palaeolithic Age) हम (40 हजार ई0पू0 से 10 हजार ई0पू0)- इस काल का मुख्य पाषाण उपरकण ब्लेड हैं। इस समय मुख्यतः दो प्रकार के परिवर्तन हुए-
1.    चकमक उद्योग की स्थापना।

2.    आधुनिक मानव होमोसेपियन्स का प्रार्दुभाव।
सिन्धु नदी के आस-पास के क्षेत्रों के छोड़कर लगभग पूरे भारत से उत्तर पुरापाषाण काल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। टोंस घाटी से रोड़ी-ढोकी, मालना में चबुतरे तथा हड्डी की मातृदेवी के साक्ष्य मिले हैं। कुछ पुरातत्व विज्ञानी इस समय के शैल मित्रों की जानकारी देते हैं।
मध्य पाषाण काल(Mesolithic Age) (9 हजार ई0पू0 से 4 हजार ई0पू0)- वैश्विक स्तर पर पहली बार मध्य-पाषाणिक उपकरण फ्रांस के मडास्वीयसंस्कृति नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। भारत में इस काल के उपकरणों की खोज का श्रेय ’कार्लोइल’ महोदय को जाता है।      मध्य पाषाणिक मानव आखेटक एवं खाद्य संग्राहक के साथ-साथ पशुपालक भी हो गया। पशुपालन के प्रमुख प्रमाण आदमगढ़ (म0प्र0) व बागौर (राजस्थान) से प्राप्त होते हैं। प्रथम पालतू पशु कुत्ता व दूसरी बकरी थी। इलाहाबाद के स्थलों सराय नहर राय और महदहा से स्तम्भ गर्त के प्रमाण मिले हैं। विंध्य क्षेत्र और भीम बेटका से प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की जानकारी मिली है।
    लगभग पूरे भारत से मध्य पाषाणिक स्थलों के साक्ष्य मिले हैं सबसे अधिक स्थल मध्य गंगाघाटी से प्राप्त हुए हैं। नर्मदा नदी घाटी, सोन नदी घाटी, बेलन नदी घाटी, भीम वेटका, विंध्य नदी घाटी, प्रवरा नदी घाटी आदि क्षेत्र प्रमुख हैं।
    मध्य पाषाणिक स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण राजस्थान के तिलवाड़ा और वागौर, गुजरात के लंघनाज, प्रतापगढ़ के सरायराय नहर, दमदम, इलाहाबाद के चोपानी मण्डो, लेखइया, मोरहना पहाड और वगहीखोर, बंगाल में वीरभानपुर, असम में सारूतारू, उड़ीसा के कुचाई, मध्य प्रदेश में भीम बेटका और होसंगावाद आदमगढ़ तथा दक्षिण भारत में तमिलनाडु के टेरी समूह आदि प्रमुख माने जाते हैं।
नव पाषाण काल(Neolithic Age) (9 हजार ई0पू0 से 1 हजार ई0पू0)- नव पाषाण काल क्रान्ति का युग कहा जाता है। भारत में नवपाषाण की खोज सर्वप्रथम 1860 ई0 में टौंस नदी घाटी से लेनसूरियर ने किया। मानव अब खाद्य संग्राहक युग से खाद्य उत्पादक युग के प्रवेश कर चुका था।
    इस काल में निम्नलिखित परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
1.    मानव ने आग का उपयोग करना सीख लिया।
2.    अब वह स्थाई रूप से रहने लगा।
3.    पहली बार कृषि के साक्ष्य बलूचिस्तान के मेहरगढ़ से प्राप्त हुए हैं प्रथम उपजाने वाली फसल गेहँ और जौ थी। मेहरगढ़ के साक्ष्य 7 हजार ई0पू0 के है।
4.    इलाहाबाद के कोलडिहवा से 6 हजार ई0पू0 के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
5.    इसी समय मानव ने धातुओं का प्रयोग करना सीख लिया। पहली बार प्रयोग में लायी जानी वाली धातु ताँबा थी।
       अब मानव ने कुम्हार के चाक पर मिट्टी के बर्तनों को (मृद्भाण्ड) बनाना सीख लिया।
नव पाषाण काल का क्षेत्रः- नव पाषाण काल के साक्ष्य भारत से लगभग सभी भागों से प्राप्त हुए मुख्य निम्न हैं-

 1.    बुर्जाहोम:- यह कश्मीर का प्रसिद्ध नव पाषाण कालीन स्थल हैं। बुर्जाहोम का अर्थ है-जन्म स्थान। इस स्थान से पता चलता है कि मानव गर्त (गड्डौ) आवास में रहता था। मानव की कब्रों के साथ हमें कुत्तों की हड्डियों के प्रमाण भी मिले हैं।
2.    गुफकराल:- यह स्थल भी कश्मीर में हैं गुफकराल का अर्थ है कुम्हार की गुफा। इससे भी मानव के रहने के पैटर्न पर प्रकाश पड़ता है। गुफकराल से अन्य उपकरणों के साथ-साथसिलबट्टे तथा हड्डी की बनी सुइयां भी मिलती है, जिससे सूचित होता है कि लोग कपड़ा-सीने की विधि से परिचित थे।
3.     चिरांद:- यह बिहार में स्थित नव पाषाण कालीन स्थल है यहाँ से हिरण की हड्डियों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं साथ ही अधिक मात्रा में औजार भी प्राप्त हुए हैं।
4.    उतनूर (आन्ध्र प्रदेश) 

5. पैय्यम पल्ली (तमिलनाडु)
6.    नासिक, ब्रम्हगिरि, हल्लूर, टी-नरसीपुर, पिकली हल (कर्नाटक) आदि नवपाषाणिक स्थल है।
ताम्र पाषाणिक संस्कृति:-
    तकनीकी दृष्टि से ताम्र पाषाणिक संस्कृति नवपाषाण काल के बाद और नदी घाटी सभ्यता के विकसित होने के पहले की मानी जाती है। परन्तु वास्तविक रूप में यह संस्कृति नव पाषाणकाल के साथ ही विकसित होती रही और भारत में इसकी स्थिति नदी घाटी सभ्यता के समकालीन पहले और बाद तक दिखाई देती है। अब अनेक अनुसंधानों से सिद्ध हो चुका है कि सैन्धव संस्कृति का विकास भी इन्हीं ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों से हुआ। माना जाता है कि भारत में पहली बार ग्राम संस्कृति की स्थापना इन्ही ताम्र पाषाणिक लोगों ने ही की। इनकी खोज का श्रेय संकालिया, मजूमदार, मैके, माधव स्वरूप वत्स, अमला नन्द घोष, विष्ट, सहित अनेक सैन्धव सभ्यता से जुड़े हुए पुरातत्व विज्ञानियों को जाता है।
    मानव द्वारा प्रयोग में लाया गया पहली धातु ताँबा मानी जाती है। लगभग 5000 ठब् इसकी खोज हो चुकी थी। वैश्विक स्तर पर सबसे पहले मेसोपाटामियाई लोगों ने इस धातु का प्रयोग किया। भारत में इस धातु का प्रयोग 3500 ठब् के आस-पास शुरू हुआ। इसका स्वतन्त्र प्रयोग न होकर इसके साथ-साथ पाषाणिक उपकरण भी चलते रहे। इन्हीं ताँबे एवं पाषाणों के गृहपयोगी एवं कृषि उपयोगी उपकरणों के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति को एक स्थायी आधार देने का प्रयास किया गया।
    महत्वपूर्ण ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों में, राजस्थान में पनपी वनास घाटी की आहार एवं गिलुन्द संस्कृति, मध्य क्षेत्र की मालवा, कायथा नवदा टोली एरण संस्कृति तथा महाराष्ट्र की जोरवे, पूनम गाँव, इनामगांव, चन्दौली, नासिक, दैमावाद आदि संस्कृति महत्वपूर्ण मानी जाती है। वास्तव में ताम्र पाषाणिक ग्रामीण संस्कृति, दक्षिण भारत मास्की, ब्रम्हगिरि एवं गंगाघाटी, पूरे भारत से पायी गयी हैं। यह ग्रामीण संस्कृतियां किसी न किसी रुप में अपने विभिन्न मृदभाण्डिक विशेषताओं के साथ भारत में द्वितीय नगरीकरण अर्थात छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पहले तक विभिन्न स्थानीय विशेषताओं के साथ विद्यमान रही। राजस्थान की आहार संस्कृति को ताम्रवती के नाम से भी जाना जाता है। गिलुन्द एक बड़ा ताम्र पाषाणिक स्थल माना जाता है। उत्तर पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र के अनेक नवपाषाणिक स्थलों से ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों के क्र्रमिक विकास का साक्ष्य मिलता है। गुमला घाटी मेहरगढ़ से लेकर अनेक सैन्धव स्थलों से भी ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं। मालवा ताम्र पाषाणिक संस्कृति   के मृदभाण्ड उत्कृष्ट कोटि में जाने जाते थे। वही पूनम गांव एवं इमाम गांव से ताम्र पाषाणिक संस्कृति नगरीय संस्कृति की तरफ बढ़ती हुई दिखाई देती है।
    ताम्र पाषाणिक संस्कृति के लोग कृषि मृदभाण्ड घासपूष एवं कच्चे मकान तथा ग्रामीण धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था को संचालित कर रहे थे। धर्म एवं अर्थव्यवस्था को एक निश्चित आधार मिला हुआ था। शिल्प एवं प्रौद्योगिक का भी विकास दिखाई देता है।
    दक्षिण भारत में जहाँ ताम्रपाषाणिक संस्कृति की पृष्ठभूमि पर लोहे के प्रयोगों एवं विशेषताओं से युक्त महापाषाणिक संस्कृति दिखाई देती है, वहीं उत्तर भारत में ताँबे एवं टिन के प्रयोग से निर्मित काँसे को आधार बनाकर विकसित कांस्य युगीन प्रथम नगरीय हड़प्पा सभ्यता का विकास होता है। निःसंदेह इन्हीं ग्रामीण संस्कृतियों ने ही भारत में नगरीय संस्कृति को न सिर्फ आधार प्रदान किया अपितु धार्मिक, आर्थिक एवं निश्चित प्राचीनतम स्वरूप प्रदान कीं।
 
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